कांग्रेस का सीएम फेस ब्राह्मण ही होगा, जानिए ब्राह्मणों की नाराजगी भुनाने व दूसरे दलों पर दबाव बनाने का प्लान
लखनऊ, 13 अक्टूबर: उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दल ब्राह्मणों का लुभाने में लगी हुई है। एक तरफ जहां बीजेपी-बीएसपी-सपा ब्राह्मणों को लुभाने के लिए प्रबुद्ध सम्मेलन करवा रही है वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस भी अपनी रणनीति में लगी हुई है। कांग्रेस की यूपी प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी अब पूरी तरह से चुनावी मोड में आ गई हैं। जिस तरह से लखीमपुर खीरी कांड के बाद पूरी कांग्रेस एक साथ योगी सरकार के खिलाफ यूपी में उतरती दिखाई दी उससे बीजेपी को भी बैकफुट पर आने के लिए मजबूर कर दिया। कांग्रेस के रणनीतिकारों की माने तो कांग्रेस अंदरखाने यह तय कर चुकी है कि यूपी में ब्राह्मण चेहरा बतौर सीएम फेस देना है। लेकिन चेहरा कौन होगा अभी तय नहीं हो पाया है चेहरे को लेकर तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

कांग्रेस के एक राष्ट्रीय सचिव ने बताया कि यह तो तय है कि कांग्रेस चुनाव से पहले ब्राह्मण चेहरा सीएम फेस के तौर पर देने जा रही है। बस नाम को लेकर संशय बना हुआ। कुछ नाम अंदर के हैं जिनपर विचार चल रहा है कुछ बड़े नेता अन्य दलों से आने वाले हैं। उनके नाम पर भी विचार चल रहा है। इसको लेकर शीर्ष नेतृत्व जल्दी ही कोई अंतिम निर्णय लेगा। नवंबर तक इस पर फैसला लिया जा सकता है।
सीएम फेस देकर विपक्षियों पर दबाव बना सकती है कांग्रेस
राष्ट्रीय सचिव ने बताया कि,
''दरअसल पार्टी ब्राह्मण चेहरा घोषित करने में फायदा देख रही है। एक तो सभी राजनीतिक दल ब्राह्मणों को लुभाने में लगे हुए हैं। सपा, बसपा और बीजेपी सभी अलग अलग नाम से सम्मेलनों का आयोजन कर रहे हैं। योगी जी बीजेपी का बड़ा ठाकुर चेहरा बन चुके हैं। लेकिन पिछले साढ़े चार साल में उनकी सरकार ने ब्राह्मणों का काफी अत्याचार किया। इसको लेकर बीजेपी में भी अंदरखाने काफी गुस्सा है। ब्राह्मण चेहरा घोषित कर कांग्रेस यूपी में एक लीड ले सकती है। इससे ब्राह्मण समुदाय को यह करने में आसानी होगी कि उनका क्या रुख होगा। दूसरा एक बार सीएम चेहरा प्रोजेक्ट होने के बाद कांग्रेस दूसरे दलों पर चुनाव से पहले चेहरा घोषित करने का दबाव बना सकती है।''
प्रियंका के दौरे के समय भी उठा था ब्राह्मण चेहरे का मुद्दा
कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी सुबह से ही लगातार बैठकें कर रही हैं। हालांकि इससे पहले पिछले महीने भी लखनऊ आईं थीं। कांग्रेस के सूत्रों का दावा है कि चुनावी अभियान को तेज करने पहुंची प्रियंका के सामने उस समय असहज स्थिति उत्पन्न हो गई जब कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी और प्रदेश अध्यक्ष लल्लू सिंह आमने-सामने आ गए। सूत्रों का दावा है कि प्रमोद तिवारी चाहते थे कि कांग्रेस की तरफ से सीएम का चेहरा प्रोजेक्ट किया जाए लेकिन अजय कुमार लल्लू इसके खिलाफ थे। दोनों गुटों के बीच टकराव को देखते हुए प्रियंका गांधी ने किसी तरह से मामले को संभाला और इसको आगे के लिए टाल दिया।

दो गुटों की लड़ाई में तीसरे या बाहरी की लग सकती है लॉटरी
कांग्रेस के सूत्रों की माने तो ब्राह्मण चेहरा देने की कवायद पिछले कई महीने से पार्टी के भीतर चल रही है। इसको लेकर प्रियंका की पिछली बैठक में चर्चा भी हुई थी। लेकिन यूपी में कांग्रेस में दो खेमे होने की वजह इस पर चर्चा नहीं हो पाई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी एक तरफ हैं तो दूसरी तरफ प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू का खेमा है। दोनों के बीच अंदरखाने खींचतान जारी है। इस बीच कांग्रेस ने अन्य नामों पर भी विचार करना शुरू कर दिया है। बताया जा रहा है कि बीजेपी के एक बड़े ब्राह्मण नेता की भी जल्द ही कांग्रेस में जवाइनिंग हो सकती है। विवाद से बचने के लिए किसी तीसरे नाम पर आलाकमान मोहर लगा सकता है।
यूपी में क्या है ब्राह्मण वोटों का समीकरण
दरअसल, यूपी की सामाजिक राजनीति कैसे काम करती है, इसका गणित समझने के लिए जनसंख्या के विभाजन को समझना जरूरी है। 2011 की जनगणना के अनुसार, व्यक्तिगत जाति का सबसे अधिक हिस्सा जाटवों का है - 12 प्रतिशत। जाटवों के बाद ब्राह्मण दूसरे स्थान पर आते हैं - लगभग 10 प्रतिशत। कुल जनसंख्या में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी के मामले में, उत्तर प्रदेश दो पहाड़ी राज्यों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बाद तीसरे स्थान पर है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण एक प्रभावशाली समुदाय रहा है। राज्य के पहले मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत इसी समुदाय से थे। दिलचस्प बात यह है कि स्वर्गीय एनडी तिवारी, जो 1989 में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री थे, वो भी ब्राह्मण थे। पहले ब्राह्मण यूपी में कांग्रेस के प्रति वफादार रहे।
मंदिर राजनीति के समय कांग्रेस कमजोर हुई, ब्राह्मण छिटकते चले गए
राजनीतिक विश्लेषक कुमार पंकज कहते हैं कि,
''जैसे ही राम जन्मभूमि आंदोलन ने गति पकड़ी, कांग्रेस राज्य में कमजोर होती गई। 1993 से 2004 तक, जब किसी एक दल को बहुमत नहीं मिल पाया था, इस समुदाय ने भाजपा का पूरा समर्थन किया, चाहे वह विधानसभा चुनाव हो या संसदीय चुनाव। 2004 तक आधे से अधिक ब्राह्मण मतदाताओं ने हमेशा भाजपा को वोट दिया। हालांकि, 2007 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए समुदाय का समर्थन 40 प्रतिशत से कम हो गया, जहां मायावती की बसपा ने बहुमत हासिल किया।''
पंकज बताते हैं कि, भाजपा को न केवल कुल मतों का 40 प्रतिशत से अधिक प्राप्त हुआ, बल्कि ब्राह्मणों का भी भारी समर्थन प्राप्त हुआ। 2014 में अनुमानित 72 प्रतिशत ब्राह्मणों ने भाजपा को वोट दिया था। 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में इस प्रवृत्ति को फिर से दोहराया गया जब पार्टी को क्रमशः 80 प्रतिशत और 82 प्रतिशत ब्राह्मण वोट मिले। इन तीन चुनावों के बाद ऐसी धारणा बनी कि ब्राह्मण वोट भाजपा के लिए हैं, यादव वोट सपा के लिए हैं और जाटव वोट बसपा के लिए हैं।












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