हाता का 'दुश्मन' जिसने Chillupar में पहली बार खिलाया कमल, हरिशंकर तिवारी के बेटे को दी पटखनी

गोरखपुर, 11 मार्च। गोरखपुर की चुनावी राजनीति की चर्चा हो तो मठ के साथ हाता का नाम न आए ऐसा कैसे हो सकता है। मठ यानि गोरखनाथ धाम का प्रभाव क्षेत्र जिसके मुखिया योगी आदित्यनाथ हैं जो यूपी में बीजेपी सरकार के भी मुखिया हैं। वहीं हाता के मुखिया हरिशंकर तिवारी हैं जिनकी कभी चिल्लूपार विधानसभा सीट पर तूती बोलती थी। इस बार यहां से उनके बेटे विनय शंकर तिवारी ने चुनाव लड़ा था।

विनय शंकर तिवारी चिल्लूपार से हारे

विनय शंकर तिवारी चिल्लूपार से हारे

पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरे योगी आदित्यनाथ तो अपने गढ़ गोरखपुर को चुना और 1 लाख वोट के भारी अंतर से जीत हासिल की। वहीं मठ के प्रतिद्वंद्वी मानी जाने वाले हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी चिल्लूपार की अपनी सीट नहीं बचा सके। इस बार विनय शंकर तिवारी को बीजेपी के प्रत्याशी ने करारी शिकस्त दे दी। विनय शंकर को शमसान बाबा के नाम से विख्यात राजेश त्रिपाठी ने हराया है। राजेश त्रिपाठी वही नेता हैं जिसने इसके पहले हाता के मुखिया और बाहुबली कहे जाने वाले हरिशंकर तिवारी को राजनीति से संन्यास लेने पर मजबूर कर दिया था।

कभी पिता को हराया था अब बेटे को

कभी पिता को हराया था अब बेटे को

इस बार राजेश त्रिपाठी ने हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी को 20 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से हरा दिया। राजेश त्रिपाठी 96977 वोट पाकर विजयी रहे वहीं विनय शंकर तिवारी को 75132 वोट ही मिले। इस तरह राजेश त्रिपाठी ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव में उतरे विनय शंकर तिवारी को हराकर अपनी पुरानी हार का हिसाब भी चुकता कर लिया। 2017 में विनय शंकर तिवारी बसपा के टिकट पर चुनाव लड़कर राजेश त्रिपाठी को हराया था।

2007 में शुरू हुई थी लड़ाई

2007 में शुरू हुई थी लड़ाई

साल था 2007 और यूपी विधानसभा चुनाव थे। हरिशंकर तिवारी की चिल्लूपार सीट से तूती बोलती थी। वे जिस भी पार्टी से खड़े हो जाएं जीत उन्हीं की हासिल होती थी। इस दौरान शमसान बाबा के नाम से मशहूर रहे राजेश त्रिपाठी ने उन्हें चुनौती दी। राजेश त्रिपाठी उस चुनाव में बसपा के टिकट पर मैदान में उतरे। राजेश त्रिपाठी ने परिणामों में सभी को चौंकाते हुए हरिशंकर तिवारी को 6933 वोटों से हरा दिया।

हरिशंकर तिवारी का राजनीतिक वनवास

हरिशंकर तिवारी का राजनीतिक वनवास

इसके बाद साल 2012 के चुनावों में फिर दोनों आमने-सामने थे। विजय तो इस बार भी राजेश त्रिपाठी को मिली लेकिन नतीजों ने ये बता दिया कि हरिशंकर तिवारी सीधे मुकाबले में ही नहीं थे। हरिशंकर तिवारी को तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। इसके बाद हरिशंकर तिवारी ने चुनाव से ही तौबा कर ली या यूं कहें कि राजेश त्रिपाठी ने उन्हें राजनीतिक वनवास में भेज दिया।

5 साल पुरानी हार का बदला

5 साल पुरानी हार का बदला

5 साल बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में राजेश त्रिपाठी बीजेपी के टिकट पर मैदान में थे और उनके मुकाबले में ताल ठोंक रहे थे हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी जो बसपा के टिकट पर थे। इस बार विनय शंकर तिवारी विधानसभा पहुंचे और राजेश त्रिपाठी को हार का मुंह देखना पड़ा

अब पांच साल बाद एक बार फिर राजेश त्रिपाठी ने हिसाब-किताब बराबर करते हुए विनय शंकर तिवारी को हरा दिया। इस तरह एक बार फिर हाता का सबसे बड़ा दुश्मन तिवारी परिवार पर भारी पड़ा है।

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