भाजपा से नजदीकी, आजम खान से मुलाकात, क्या है शिवपाल यादव की नई योजना, बढ़ा सकती है भतीजे अखिलेश की मुश्किल
लखनऊ, 22 अप्रैल। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जब 2012 में प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उस वक्त अखिलेश यादव पार्टी का मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं थे। मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कमान सौंपी और उसके बाद पार्टी में बड़ा बदलाव देखने को मिला। अखिलेश यादव ने समय के साथ ना सिर्फ प्रदेश सरकार की कमान संभाली बल्कि पार्टी को भी अपने हाथ में ले लिया। अखिलेश यादव ने खुद को पार्टी का अध्यक्ष घोषित किया, जिसके बाद अखिलेश यादव और चाचा शिवपाल यादव के बीच तकरार खुलकर सामने आने लगी। शिवपाल यादव ने बाद में खुद को सपा से अलग कर लिया और अपनी अलग पार्टी प्रगतिशील समाज पार्टी बना ली।

साथ आए लेकिन मन नहीं मिला
शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच रिश्ता तकरार का बना रहा। हालांकि इस बार विधानसभा चुनाव में शिवपाल यादव ने अखिलेश यादव के साथ हाथ मिलाया और सपा के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा। लेकिन चुनाव में साथ आने के बाद दोनों के मन कभी भी एक नहीं दिखे। कुछ तस्वींरें अखिलेश और शिवपाल के साथ की सामने आईं, जिससे दोनों के बीच की दूरी को हवा मिली। यहां तक कि 26 मार्च को अखिलेश यादव ने सपा के नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक बुलाई, लेकिन शिवपाल यादव को इसमे नहीं बुलाया गया। हालांकि सपा को विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा लेकिन पार्टी ने पिछले चुनाव की तुलना में काफी बेहतर प्रदर्शन किया।

तकरार का रिश्ता बना रहा
यूपी में विधानसभा चुनाव में हार के बाद अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच तकरार का रिश्ता बरकार रहा। पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान के खिलाफ योगी सरकार ने बड़ी कार्रवाई की, जिसके बाद आजम खान को जेल जाना पड़ा है। हालांकि जेल से चुनाव लड़ने के बाद भी आजम खान ने जीत दर्ज की। लेकिन अखिलेश यादव पर पिछले काफी समय से आजम खान की अनदेखी का आरोप लगता आया है। उनके विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि अखिलेश यादव ने आजम खान को जेल से बाहर लाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। इस बीच आजम खान से मिलने के लिए शिवपाल यादव सीतापुर जेल पहुंचे।

आजम से मुलाकात के मायने
शिवपाल यादव का आजम खान से जेल में मुलाकात के कई मायने निकाले जा रहे हैं। आजम खान से मुलाकात के बाद शिवपाल यादव ने कहा कि आजम के साथ इस सरकार में उत्पीड़न हो रहा है, चुनाव से पहले भी मैंने उनसे मुलाकात की थी। उनके परिवार के साथ मेरे अच्छे संबंध हैं। लेकिन हकीकत यह है कि आजम खान को झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल में उत्पीड़न किया जा रहा है।

शिवपाल की खुली चुनौती
कयास लगाए जा रहे थे कि शिवपाल यादव भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो सकते हैं। तमाम रिपोर्ट के अनुसार शिवपाल यादव की भाजपा के साथ करीबी बढ़ी है। इस बात को तब हवा और मिली जब अखिलेश यादव ने कहा कि शिवपाल विपक्षी दलों के संपर्क में हैं। अखिलेश के इस बयान के बाद शिवपाल ने खुले तौर पर कहा था कि अगर मेरे नेता को लगता है कि मैं उनके साथ नहीं हूं तो वह मुझे तुरंत पार्टी से निकाल दें। मुझे पार्टी से निकालने में देर ना करें। मैंने सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था और सपा के 111 विधायकों में से एक हूं।

भाजपा की ओर झुकाव
यहां याद रखने वाली बात यह है कि भाजपा के साथ संबंधों को लेकर शिवपाल ने कहा था कि मैं फैसला लूंगा और सभी को इस बारे में जानकारी दूंगा। उन्होंने कहा था कि इस बात को लेकर पार्टी में चर्चा चल रही है, इसकी समीक्षा हो रही है, जब फैसला होगा मैं इस बारे में जानकारी दूंगा। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि एक तरफ जहां शिवपाल भाजपा के संपर्क में हैं, दूसरी तरफ अखिलेश यादव के खिलाफ खुलकर बयानबाजी कर रहे हैं और आजम खान से मुलाकात कर रहे हैं ,उसके बाद सवाल यह उठ रहा है कि आखिर शिवपाल यादव की रणनीति क्या है।

क्या है आखिर शिवपाल की रणनीति
दरअसल अखिलेश यादव ने जिस तरह से आजम खान के साथ बेरुखी दिखाई और आजम खान के समर्थकों ने अखिलेश यादव को लेकर नाराजगी जाहिर की, उसके बाद शिवपाल यादव आजम खान के समर्थकों और खासकर मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में लाना चाहते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने मुस्लिम उम्मीदवारों को बहुत ही कम टिकट दिया, जिन मुस्लिम उम्मीदवारों को अखिलेश ने टिकट नहीं दिया, उसमे से अधिकतर को बसपा ने टिकट दिया। यही नहीं भाजपा हिंदुत्ववादी छवि की बदौलत यूपी में अपनी पैठ को मजबूत करने में लगी है, जिसका असर चुनावी नतीजों में भी दिखा, ऐसे में अखिलेश यादव की सॉफ्ट हिंदू रणनीति बैकफायर कर गई। लिहाजा इस मौके शिवपाल यादव भुनाना चाहते हैं।












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