अयोध्या में राम मंदिर बनने के बावजूद यूपी क्यों हारी बीजेपी? राम नगरी नहीं, इस सीट के नतीजे में छिपा है जवाब
UP Lok Sabha Chunav 2024: अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के बावजूद यूपी में बीजेपी करीब आधी सीटें क्यों हार गई, यह बहस का मुद्दा बन चुका है। सिर्फ भाजपा समर्थक ही सोच रहे थे कि राम मंदिर पार्टी की जीत की गारंटी बनेगा, ऐसा नहीं है। विरोधियों में भी यह डर भरा हुआ था।
यहां तक कि राम मंदिर के प्रभाव से कांग्रेस-सपा को कई सीटों पर उम्मीदवार तक नहीं मिल रहे थे। लेकिन, जब चुनाव अभियान शुरू हुआ तो जमीनी स्तर पर माहौल बदलना शुरू हो गया। चुनाव नतीजे आने के बाद चीजें साफ हो रही हैं कि आखिर माहौल अचानक पलट क्यों गया?

सीतापुर की हार में छिपा है बीजेपी की हार की वजह
भगवान राम की नगरी अयोध्या से करीब 200 किलोमीटर दूर है सीतापुर। नाम से स्पष्ट है कि सीतापुर का रामायण में क्या महत्त्व है। यह भी बीजेपी का गढ़ था। लेकिन, इस चुनाव में अयोध्या (फैजाबाद) की तरह भाजपा का यह किला भी ध्वस्त हो गया।
सीतापुर सीट पर सपा-कांग्रेस को नहीं मिल रहा था उम्मीदवार
अब सीतापुर में इस बार के चुनाव में क्या हुआ है, यह समझने की कोशिश करते हैं। इससे एक अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रदेश की बाकी सीटों पर क्या हुआ होगा। दरअसल, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ही यह सीट नहीं लेना चाहती थी। क्योंकि, कोई भी नेता सीतापुर से चुनाव लड़ने के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था।
राम मंदिर के प्रभाव से भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए कोई नहीं था तैयार
इसकी वजह ये थी कि पूरे देश की तरह यहां भी एक आम धारणा बनी हुई थी कि अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के बाद यहां से भाजपा को हरा पाना लगभग असंभव है। पहले यह सीट समाजवादी पार्टी को मिली। वह चाहती थी कि 6 बार के पूर्व विधायक नरेंद्र वर्मा यहां से चुनाव लड़ें।
सीट थोपे जाने के बाद एक उम्मीदवार ने चार दिन बाद लौटाया कांग्रेस का टिकट
पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने काफी कोशिशें की, लेकिन उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। जब प्रत्याशी नहीं मिल रहा था तो अखिलेश क्या करते। उन्होंने कांग्रेस के खाते में सीट डाल दी। कांग्रेस ने बसपा सरकार में मत्री रहे नकुल दुबे का नाम घोषित किया। चार दिन बाद उन्होंने भी पार्टी को टिकट सरेंडर कर दिया।
कांग्रेस ने लाचारी में राकेश राठौर को थमाया टिकट
अब कांग्रेस के पास सीट तो थी, लेकिन पार्टी टिकट पर लड़ने के लिए कोई राजी ही नहीं हो रहा था। जानकारों का भी कहना है कि वर्मा और दुबे दोनों ने ही निश्चित हार के डर से टिकट लेने से मना कर दिया। किसी को तो टिकट थमाना था तो कांग्रेस ने राकेश राठौर को खोज निकाला। उनके बारे में स्थानीय लोगों का कहना है कि न तो उन्हें कोई जानता था और न ही उनकी ऐसी कोई छवि थी, जो लोकसभा चुनाव लड़ सकें।
कांग्रेस के 'अनजान' उम्मीदवार ने बीजेपी के दिग्गज को हराया
कांग्रेस ने टिकट दिया तो राठौर भी मना नहीं कर पाए। हालांकि, कांग्रेस तनाव में थी। वह जिस तेली (ओबीसी) समाज से आते हैं, उनकी सीतापुर में कोई आबादी भी नहीं है। लेकिन, कांग्रेस के इसी उम्मीदवार ने भाजपा के दिग्गज राजेश वर्मा को 89,641 वोटों से हरा दिया।
कैसे पलट गई सीतापुर की चुनावी हवा?
राठौर की किस्मत टिकट मिलते ही चमकने लगी। भले ही उनकी अपनी जाति की आबादी सीतापुर में नहीं हो, इंडिया ब्लॉक की ओर से आरक्षण और संविधान खत्म करने वाले दावों (भाजपा के खिलाफ) ने उनके पक्ष में ओबीसी और दलितों को गोलबंद करना शुरू कर दिया।
जानकारी यहां तक है कि जब राठौर के पक्ष में हवा के रुख की भनक लगी तो वर्मा ने अपने दोस्तों से कहा कि उन्होंने अखिलेश के ऑफर को ठुकरा कर अपने जीवन की 'सबसे बड़ी गलती' कर दी है।
सीतापुर सिर्फ एक उदाहरण है। धौरहरा, बाराबंकी, फैजाबाद से लेकर कौशांबी-प्रतापगढ़-इलाहाबाद इलाके तक ही नहीं, पूर्वी और मध्य यूपी में इंडिया ब्लॉक की जबर्दस्त सफलता के पीछे बीजेपी के खिलाफ इसी तरह की ओबीसी और दलितों की गोलबंदी बताई जा रही है।
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