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UP में लोकसभा चुनावों के लिए BJP ने बदली रणनीति, सवर्ण नेताओं के लिए क्या है नसीहत? जानिए

2024 के लोकसभा चुनावों से पहले लगता है कि घोसी उपचुनाव के नतीजों ने बीजेपी को उत्तर प्रदेश में अपनी रणनीति बदलने को मजबूर कर दिया है। खासकर प्रदेश में दलित वोट को लेकर बीजेपी बहुत ही सतर्क हो गई है।

उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों का वोट लगभग 21% है। बीजेपी ने इतने बड़े वोट बैंक में अपनी पहुंच मजबूत करने के लिए 'बस्ती संपर्क अभियान' की तैयारी की है। इसके तहत राज्य के करीब 2,000 गांवों में पहुंचकर केंद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ सरकार की ओर से चलाए जा रहे कल्याणकारी योजनाओं को लेकर दलितों के बीच पहुंचने की योजना है।

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दलितों के बीच जनाधार बढ़ाने के लिए 'बस्ती संपर्क अभियान
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक पहले की तैयारी ये थी कि एक हफ्ते के 'बस्ती संपर्क अभियान' के तहत पार्टी गांधी जयंती से ही दलितों की ज्यादा जनसंख्या वाले इन गांवों में जाएगी और केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं से मिल रहे लाभों को लेकर जनता से संपर्क करेगी। लेकिन, फिलहाल इसे दिसंबर तक के लिए टाले जाने की जानकारी मिल रही है।

कांशीराम-मायावती की आलोचना से बचने को कहा
जानकारी के मुताबिक इस अभियान में शामिल होने वाले नेताओं के लिए पार्टी ने यह फैसला किया है कि वे किसी भी सूरत में बसपा सुप्रीमो मायावती और बीएसपी संस्थापक कांशीराम के खिलाफ कोई भी नकारात्मक टिप्पणी नहीं करेंगे।

पार्टी को लेकर चल रही इस तरह की बातों पर यूपी बीजेपी अनुसूचित जाति मोर्चा के अध्यक्ष राम चंद्र कन्नौजिया का कहना है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं से यही कहा गया है कि 'किसी के' भी खिलाफ 'नकारात्मक' प्रचार के बजाए, सिर्फ बीजेपी की विचारधारा को प्रमुखता से सामने रखें। लेकिन, पार्टी सूत्रों से यह बात सामने आई है कि मोर्चा के लोगों से स्पष्ट कर दिया गया है कि मायावती का दलितों के बीच में एक खास स्थान है, इसलिए पार्टी इस विशेष स्थान को किसी भी हालत में खलल नहीं डालना चाहती।

पार्टी को दलितों की नाराजगी का डर
राज्य के एक और वरिष्ठ भाजपा नेता ने भी कहा है कि 'ये बात सच है कि दलित समुदाय ने कांशीराम और मायावती के प्रति परंपरागत रूप से एक विशेष निष्ठा दिखाई है। उनके खिलाफ बोलने से वे नाराज हो सकते हैं, जो कि बीजेपी के लिए हानिकारक हो सकता है।' उनके मुताबिक 'बस्ती संपर्क अभियान' का मुख्य लक्ष्य समाज के दलित समाज से बीजेपी सरकार की कल्याणकारी योजना के लाभों पर फीडबैक जुटाना है।

सवर्ण नेताओं के लिए क्या है नसीहत?
उन्होंने कहा कि 'कार्यकर्ताओं से कहा गया है कि सिर्फ हमारी पार्टी के नेताओं जैसे कि पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ की उपलब्धियों के बारे में बात करें।' तथ्य ये है कि बीजेपी ने अपने कई सवर्ण सांसदों और एमएलए समेत सारे प्रमुख नेताओं से कहा है कि इस अभियान को लेकर अनुसूचित जाति मोर्चा से तालमेल बनाएं, जो इसकी अगुवाई कर रहा है।

घोसी उपचुनाव का असर?
जानकारों के मुताबिक यूपी में दलितों के बीच अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए यह बीजेपी की नई रणनीति है, क्योंकि 21% वोट बैंक के बीच पार्टी का आधार मजबूत करना समय की मांग भी है। गौरतलब है कि भाजपा की यह बदली हुई रणनीति तब सामने आ रही है, जब पूर्वांचल की घोसी विधानसभा उपचुनाव में पार्टी को अप्रत्याशित रूप बहुत बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा है।

इस सीट पर मायावती ने अपनी पार्टी का उम्मीदवार नहीं दिया था। उनकी ओर से पार्टी के कोर वोटरों से कहा गया था कि मतदान से दूर ही रहें। लेकिन, चुनाव परिणाम से जो रुझान सामने आए हैं, उससे अनुमान लगाया जा रहा है कि शायद दलितों के वोट का बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में गया है। सपा 26 विपक्षी दलों के गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव एलायंस (INDIA) में शामिल है।

अखिलेश के पीडिए का भी असर?
जानकारों के मुताबिक बीजेपी यूपी में दलितों के मामले में खासकर इसलिए फूंक-फूंक कर कदम रख रही है, क्योंकि अखिलेश यादव की पार्टी ने पीडीए (पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक) की रणनीति पर काम करना शुरू किया है। 2024 के चुनावों से पहले बीजेपी विपक्ष की इस रणनीति को लेकर अभी से सावधानी बरतना चाह रही है।

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