यूपी चुनाव में योगी के लिए सिरदर्द बन रहे हैं जाट ?, जानिए कैसे डैमेज कंट्रोल में जुटी बीजेपी
लखनऊ, 11 नवंबर: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनाव से पहले बीजेपी पश्चिम यूपी में सियासी समीकरण को लेकर बेहद सतर्क है। पिछले तीन चुनावों से जो जाट बिरादरी बीजेपी का समर्थन करती नजर आ रही थी इस बार किसान आंदोलन की वजह से उनमें बेहद नाराजगी देखी जा रही है। जाटों की नाराजगी से होने वाले संभावित नुकसान से बचने के लिए बीजेपी ने अब जाटों के अलावा गुर्जर अन्य जातियों पर फोकस करना शुरू कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें, तो पाँच सितंबर की 'किसान महापंचायत' ने बीजेपी नेताओं को चिंता में डाल दिया है। क्योंकि ये महापंचायत उस क्षेत्र में हुई थी, जिसके दम पर बीजेपी ने पिछले तीन चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया था।

2013 से पहले रालोद काफी मजबूत स्थिति में था
साल 2013 से पहले तक इस क्षेत्र में राष्ट्रीय लोकदल सशक्त स्थिति में था। लेकिन 2013 में हुए मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद इस क्षेत्र के राजनीतिक समीकरणों में भारी बदलाव देखा गया। साल 2012 के चुनाव में बीजेपी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुल 38 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन दंगों के बाद बदले राजनीतिक माहौल की वजह से साल 2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया था। इसके बाद साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने 88 सीटों पर जीत हासिल की है। 2019 में भी इस क्षेत्र में बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया।

तीन चुनावों में बीजेपी को मिला समर्थन, इस बार जाट नाराज
इस क्षेत्र की राजनीति को बेहद क़रीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार मुकेश चौहान बताते हैं कि, "दंगों से पहले तक यहाँ चौधरी अजीत सिंह की पार्टी आरएलडी का बोलबाला था। दंगों से पहले सपा सरकार की पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रति बेरुख़ी और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सबसे ज़्यादा फ़ायदा बीजेपी को मिला। 2014 के चुनावों में बीजेपी ने इस क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन किया। इसके बाद साल 2017 और 2019 के चुनाव में बीजेपी को जाट समुदाय का समर्थन मिला। लेकिन इस बार जाट समुदाय बीजेपी से नाराज़ नज़र आ रहा है।"

क्या गुर्जरों के सहारे नैया पार हो सकती है?
उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय राजनीतिक रूप से काफ़ी प्रभावशाली माना जाता है और बीजेपी साल 2013 के बाद से लगातार इस समुदाय को अपने साथ रखने की कोशिशें करती रही है। इन्हीं कोशिशों के दम पर बीजेपी ने साल 2017 के विधानसभा चुनाव में 2012 की अपेक्षा बेहतरीन प्रदर्शन किया। लेकिन गन्ना किसानों की समस्याओं और किसान आंदोलन की वजह से अब यह समुदाय बीजेपी से दूरी बनाता हुआ दिख रहा है।

किसान महापंचायत के बाद से ही बीजेपी सतर्क
चौहान बताते हैं कि पांच सितंबर को जो महापंचायत हुई, उसमें कम से कम चार-पांच लाख किसान अपने आप शामिल हुए। ये संख्या के लिहाज़ से ये पिछले 30 सालों में सबसे बड़ी किसानों की सभा थी। इसमें सरकार के प्रति नाराजगी खुलकर दिखाई दी। अब सवाल उठता है कि इसका फ़ायदा किसे मिलेगा, तो इसका जवाब राष्ट्रीय लोकदल है। ये बीजेपी की चिंता का सबसे बड़ा सबब है। ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी अपनी इस चिंता के निदान के लिए क्या कर सकती है। राजनीतिक हल्कों में कयास लगाए जा रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ इसी समस्या का हल निकालने के लिए गुर्जर बाहुल्य क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं। क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर, जाटों के बाद दूसरा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली समुदाय है। इसका प्रभाव सहारनपुर से लेकर गौतम बुद्ध नगर तक है।

जाटों के समर्थन से मिली थी बीजेपी को शानदार जीत
उत्तर प्रदेश की राजनीति और जाति समीकरण पर नज़र रखने वाले मेरठ विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर मुकेश त्यागी कहते हैं कि, ''जाटों के समर्थन की वजह से बीजेपी को शानदार जीत मिली थी। वह कहते हैं, "पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का प्रभाव लगभग 100 विधानसभा सीटों पर दिखाई पड़ता है। वहीं, गुर्जर समुदाय का असर 15 से 20 सीटों पर है. ऐसे में बीजेपी का ये सोचना ग़लत है कि वह कुछ जातियों को एक साथ लाकर अपने नुक़सान की भरपाई कर सकती है( क्योंकि क्लास (वर्ग) हमेशा कास्ट (जाति) पर भारी पड़ता है। इसलिए जाति को पकड़कर एक वर्ग में तब्दील होते किसानों, जिनमें जाट गुर्जर और मुसलमान सभी शामिल हैं, की नाराजगी से पैदा हुई चुनौती का सामना नहीं किया जा सकता।"












Click it and Unblock the Notifications