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नेमप्लेट विवाद: मुस्लिम NGO अब नहीं लगाएंगे कांवड़ियों के लिए राहत शिविर, कहा- गंगा-जमुनी तहजीब बना रहे, पर...

kanwar Yatra Name Plate Row: उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक समुदाय (मुस्लिम) द्वारा संचालित कई गैर सरकारी संगठनों (NGO) ने होटल-ढाबों, फलों के दुकानों और अन्य व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बाहर नाम प्लेटों को लेकर बढ़ते विवाद के बीच कांवड़ियों के लिए अपने वार्षिक राहत शिविरों को रद्द करने का फैसला किया है।

जी हां, रिपोर्ट के मुताबिक दुकानों के आगे मालिक के नेमप्लेट लगाने के योगी सरकार के फैसले के विवाद के बीच अब कई मुस्लिम एनजीओ ने फैसला लिया है कि वो कांवड़ियों के लिए जो कैंप लगाते थे, उसको इस साल नहीं लगाएंगे।

kanwar Yatra Name Plate Row

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टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक विवाद के बीच मुस्लिम एनजीओ ने कांवड़ियों के लिए राहत शिविर ना लगाने का फैसला किया है। ये शिविर हर साल कांवड़ियों के लिए आयोजित किए जाते थे, जिसमें सड़कों और राजमार्गों पर लंबी दूरी तक पैदल चलने वाले हजारों थके हुए भक्तों को भोजन, रहने के लिए जगह, मेडिकल सुविधा और यहां तक ​​कि आगे की यात्रा के लिए पैर की मालिश भी की जाती थी।

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पैगाम-ए-इंसानियत के अध्यक्ष आसिफ राही बोले- हम सांप्रदायिक सद्भाव चाहते हैं, लेकिन...

मुजफ्फरनगर में पैगाम-ए-इंसानियत के अध्यक्ष आसिफ राही ने भारी मन से अपने राहत शिविर को रद्द करने की घोषणा की। यह शिविर, जो सबसे बड़ा है, आमतौर पर मीनाक्षी चौक में शहर के केंद्र में आयोजित किया जाता है, जिसका उद्देश्य "गंगा-जमुनी तहजीब को बनाए रखना" है। यह पिछले 17 वर्षों से नियमित रूप से आयोजित किया जाता रहा है।

आसिफ राही ने कहा, "हम क्या कर सकते हैं? हम सांप्रदायिक सद्भाव चाहते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि वे (स्थानीय प्रशासन) केवल राजनीति करना चाहते हैं।"

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"सिर्फ मुसलमान ही नहीं, हिंदू भी सेक्युलर फ्रंट के सदस्य हैं''

सेक्युलर फ्रंट के संस्थापक गौहर सिद्दीकी ने "नए दिशा-निर्देशों के कारण" इस साल कांवड़ियों के लिए अपने एनजीओ के कार्यक्रमों को रद्द करने का फैसला किया। सिद्दीकी ने कहा, "सिर्फ मुसलमान ही नहीं, हिंदू भी सेक्युलर फ्रंट के सदस्य हैं। हम 16 सालों से कांवड़ियों का स्वागत करते आ रहे हैं, उन पर फूल बरसाते हैं और फल बांटते हैं। इस साल बहुत ज्यादा अनावश्यक नकारात्मकता है। कांवड़ियों की सेवा के लिए हमें प्रशासन की अनुमति लेनी होगी।

आवाज़-ए-हक़ के संस्थापक शादाब खान ने भी इस साल अपने एनजीओ की भागीदारी के बारे में अनिश्चितता जताई है। उन्होंने कहा है कि, यह वाकई अजीब है। हमें नहीं लगता है कि इस साल हम अपना कैंप लगा पाएंगे।

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