'लगता है किसी भूत ने FIR दर्ज कराई है', इलाहाबाद हाई कोर्ट ने UP पुलिस को क्यों लगाई फटकार?
Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुरुषोत्तम सिंह के खिलाफ आपराधिक आरोपों को खारिज कर दिया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता पुरुषोत्तम सिंह के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है, जिसमें पुलिस ने एक ऐसे व्यक्ति की शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की, जो कई साल पहले ही मर चुका था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि मृतक द्वारा कथित तौर पर दिए गए बयान के आधार पर बाद में आरोप पत्र दायर किया गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, "यह बहुत अजीब है कि एक मृत व्यक्ति ने न केवल एफआईआर दर्ज की है, बल्कि उसने अपना बयान भी दर्ज किया है।''

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा- लगता है किसी भूत ने FIR दर्ज कराई है
न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने 6 अगस्त को पारित अपने आदेश में टिप्पणी करते हुए कहा, "यह बहुत ही अजीब है कि एक मृत व्यक्ति ने न केवल एफआईआर दर्ज कराई है, बल्कि जांच अधिकारी के समक्ष अपना बयान भी दर्ज कराया है।" अदालत ने आगे कहा, "इसके बाद, वर्तमान मामले में उसकी (मृतक की) ओर से वकालतनामा भी दायर किया गया है। ऐसा लगता है कि सारी कार्यवाही एक भूत द्वारा की जा रही है।"
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने UP पुलिस को लगाई फटकार
अदालत ने कुशीनगर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) को इस अजीबोगरीब मामले में शामिल जांच अधिकारी के आचरण की जांच करने का निर्देश दिया। कोर्ट जांच के बाद ये जानना चाहती है कि कानूनी प्रक्रिया में ऐसी बड़ी गलतियां कैसे हुईं और इन कार्रवाइयों के लिए जिम्मेदार लोग कौन हैं? कोर्ट ने कहा है कि इसके लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
जानिए क्या है पूरा मामला?
यह मामला कुशीनगर जिले के कोतवाली हाटा थाने में 2014 में दर्ज एक एफआईआर से शुरू हुआ था। एफआईआर में प्रकाश नाम एक शख्स को मुखबिर बताया गया था, जबकि प्रकाश की मृत्यु 19 दिसंबर 2011 को हो चुकी थी।
प्रकाश की मौत के स्पष्ट सबूतों के बावजूद, जांच के दौरान, अधिकारी ने कथित तौर पर एक बयान दर्ज किया जैसे कि प्रकाश जीवित था और कानूनी कार्यवाही में भाग लेने में सक्षम था। इसके बाद 23 नवंबर, 2014 को एक आरोप पत्र दायर किया गया, जिसमें प्रकाश को अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में सूचीबद्ध किया गया।
कोर्ट ने कहा है कि, ये घटनाएं बताती हैं कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों के भीतर सही तरीके से निगरानी नहीं की जाती है। कार्यवाही को रद्द करने का कोर्ट का फैसला जांच के तरीकों में खामियों को उजागर करता है।
कानूनी प्रक्रियाओं में मृत व्यक्ति की संलिप्तता न केवल जनता के विश्वास को कम करती है, बल्कि न्याय को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार लोगों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाती है। कोर्ट ने कहा है कि, ये सुनिश्चित कीजिए कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।












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