Live-in Relationship पर कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश- 'शादीशुदा पुरुष संग महिला का रहना अपराध नहीं'
Live-in Relationship Allahabad High Court Decision: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कहा है कि कोई शादीशुदा पुरुष अगर किसी बालिग (वयस्क) महिला की मर्जी से लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है, तो यह कोई कानूनी अपराध नहीं है। अदालत ने जोर देकर कहा कि कानून और सामाजिक नैतिकता अलग-अलग हैं। सिर्फ समाज की सोच के आधार पर सहमति देने वाले वयस्क पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता जोड़े अनामिका और नेत्रपाल की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है और पुलिस को उन्हें पूर्ण सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया है। साथ ही, महिला के परिवार को चेतावनी दी है कि वे जोड़े को कोई नुकसान न पहुंचाएं, न घर में घुसें और न ही किसी माध्यम से संपर्क करने की कोशिश करें।

Allahabad High Court Decision: कोर्ट का अहम फैसला
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डिविजन बेंच ने क्रिमिनल रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि जहां एक शादीशुदा पुरुष किसी बालिग महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा हो, वहां किसी भी तरह का अपराध नहीं बनता। नैतिकता और कानून को अलग रखना चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला की मां द्वारा दर्ज अपहरण की FIR (केस क्राइम नंबर 4/2026, थाना जैतीपुर, शाहजहांपुर) में भी अनामिका की उम्र 18 वर्ष बताई गई थी, यानी वह बालिग है। दोनों पक्षों का संयुक्त हलफनामा भी कोर्ट के समक्ष पेश किया गया, जिसमें उन्होंने अपनी मर्जी से साथ रहने की बात कही।
Shahjahanpur Live-in Relationship Case: मामला क्या है?
8 जनवरी 2026 को अनामिका की मां कांति ने शाहजहांपुर के जैतीपुर थाने में FIR दर्ज कराई थी। आरोप था कि नेत्रपाल ने उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर ले गया और इसमें धर्मपाल नाम के व्यक्ति ने मदद की। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 के तहत मामला दर्ज किया।
अनामिका ने पहले ही शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत दी थी कि वह अपनी मर्जी से नेत्रपाल के साथ रह रही है और उसके परिवार वाले ऑनर किलिंग की धमकी दे रहे हैं। कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि पुलिस ने इस शिकायत पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।
कोर्ट के मुख्य आदेश क्या ?
- जोड़े की गिरफ्तारी पर अगले आदेश तक रोक।
- शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) को जोड़े की सुरक्षा की व्यक्तिगत जिम्मेदारी सौंपी गई।
- महिला के परिवार के किसी भी सदस्य को जोड़े को नुकसान पहुंचाने, संपर्क करने या घर में घुसने से रोका गया।
- मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल 2026 को होगी।
- राज्य को काउंटर एफिडेविट दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया गया।
- आदेश की कॉपी 24 घंटे के अंदर संबंधित अधिकारियों को भेजने के निर्देश।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2018 के शक्ति वाहिनी मामले का हवाला देते हुए कहा कि वयस्कों की सुरक्षा देना पुलिस का कर्तव्य है।
कानूनी और सामाजिक नजरिया क्या है?
भारतीय कानून में दो सहमति देने वाले वयस्क के बीच लिव-इन रिलेशनशिप को अपराध नहीं माना जाता, भले ही एक पक्ष शादीशुदा हो। कोर्ट ने बार-बार कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता (आर्टिकल 21) सामाजिक दबाव से ऊपर है। हालांकि, शादीशुदा व्यक्ति पर पत्नी द्वारा अलग से कानूनी कार्रवाई (जैसे क्रूरता या रखैल रखने संबंधी) हो सकती है, लेकिन यह अपहरण या जबरन ले जाने का मामला नहीं बनता जब महिला खुद अपनी मर्जी से साथ रह रही हो। यह फैसला उन कई मामलों में राहत दे सकता है, जहां परिवार ऑनर किलिंग या जबरन अलग करने की कोशिश करते हैं।












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