अखिलेश से हो रही गलतियां कहीं भारी न पड़ जाएं , जानिए उनकी चार बड़ी चूक के बारे में जो डाल सकती हैं असर

लखनऊ, 2 सितम्बर: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनाव से पहले सारी पार्टियां अपनी अपनी मोर्चाबंदी में जुटी हुई हैं। समीकरण बैठाने के दौरान एक भी चूक राजनीतिक दलों पर भारी पड़ सकती है। समाजवादी पार्टी के चीफ अखिलेश यादव भी अपनी चुनावी तैयारियों में लगे हैं। योगी सरकार पर हर रोज नया वार कर रहे अखिलेश पूरी तरह से आक्रामक नजर आ रहे हैं। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो पिछले कुछ महीनों में उनसे बड़ी गलतियां हुई हैं जिनका फायदा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिलता दिख रहा है। आइए जानते हैं कि अखिलेश की चार बड़ी चूक के बारे में जिनका खामियाजा उन्हें उठाना पड़ सकता है।

अखिलेश यादव

अखिलेश यादव का कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि न देना
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का 21 अगस्त को निधन हुआ था। उनके निधन के बाद अगले दिन पीएम मोदी, पूर्व मुख्यमंत्री मायावती से लेकर कई बड़े नेताओं ने उनके आवास पर जानकार उनको श्रद्धांजलि दी थी। मायावती ने कल्याण सिंह के आवास जाकर अपना मास्टर स्ट्रोक तो खेल दिया लेकिन अखिलेश चूक गए। अखिलेश को लगा कि उनके वहां जाने से मुस्लिम वोट बैंक के छिटकने का खतरा है। लेकिन राजनीति में कभी कभी आपको मानवता और नैतिकता भी देखनी पड़ती है। लिहाजा राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि उन्हें कल्याण की श्रद्धांजलि में जाना चाहिए था। हालांकि कल्याण सिंह और पूर्व सीएम मुलायम सिंह एक दूसरे के धुर विरोधी रहे हैं। एक समय था जब कल्याण सिंह ने भाजपा छोड़कर सपा का दामन भी थामा था।

योगी और अखिलेश के बीच 'अब्बाजान' का विवाद
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक बयान को लेकर भी पिछले दिनों हंगामा मचा हुआ था। योगी ने एक निजी चैनल के कार्यक्रम में अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव को अब्बाजान बता दिया था। इससे अखिलेश ने अपना आपा खो दिया था। उन्हें लगा कि योगी कैसे उनके पिता का अपमान कर सकते हैं। योगी के इस बयान पर पलटवार करते हुए अखिलेश ने कहा था कि सीएम को अपनी मार्यादा में रहना चाहिए। नहीं तो मैं भी उनके पिता को कुछ बोल दूंगा। इसी विवाद को आगे बढ़ाते हुए योगी ने विधानसभा में भी अपने भाषण के दौरान अखिलेश पर तंज कस दिया। योगी ने कहा कि पता नहीं अखिलेश को अब्बाजान शब्द से परहेज क्यों हैं। ये शब्द तो कोई गलत नहीं हैं। राजनीतिक पंडितों की माने तो इसका फायदा बीजेपी को ही मिला। वह अखिलेश को अपनी राजनीतिक पिच पर खिलाने में कामयाब रही।

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    कोरोना वैक्सीन न लगवाने का हठ, वैक्सीन को बीजेपी का बता दिया
    कोरोना की दूसरी लहर में भारी संख्या में लोगों की मौतें हो रही थीं। लोग अपनों के इलाज के लिए इधर उधर भटक रहे थे। सरकार ने कोविडशील्ड और को वैक्सीन का इंतजाम करवाया था। लोगों को जब कोरोना की वक्सीन लगनी थी तो अखिलेश यादव ने एक विवादित बयान दे दिया। उन्होंने कहा कि यह वैक्सीन बीजेपी की है। जब तक सभी लोगों को वैक्सीन नहीं लग जाती मैं वैक्सीन नहीं लगवाउंगा। अखिलेश के इस बयान का भी जनता के बीच गलत संदेश गया। अखिलेश को जनता को यह आश्वस्त करना चाहिए था कि सभी लोग आगे आकर वैक्सीन लगवाएं और खुद आगे आकर वैक्सीन लगवानी चाहिए थी। लेकिन वो ऐसा करने में नाकाम रहे। इस विवाद का फायदा भी बीजेपी को मिला और जनता के बीच अखिलेश पर बीजेपी को हमला करने का मौका मिल गया और इसका बीजेपी के नेताओं ने भरपूर फायदा उठाया।

    अखिलेश यादव

    मुख्तार अंसारी के भाई को पार्टी में शामिल करना
    यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक समय खुद ही पार्टी के अंदर माफियाओं को लेकर जीरो टॉलरेंस की बात कही थी। उनका कहना था कि पार्टी में माफिया और उनके परिवारों के लिए कोई जगह नहीं है। अखिलेश यादव ने बसपा सांसद और सिबगतुल्लाह अंसारी के भाई अफजाल अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के सपा में विलय का विरोध किया था। इसको लेकर वो अपने चाचा शिवपाल से भी भिड़ गए थे। इस विवाद को लेकर काफी दिनों तक शिवपाल और अखिलेश के बीच मतभेद बने रहे। इसके अलावा अतीक अहमद और बाहुबली डीपी यादव जैसे चेहरों को पार्टी में आने से रोकने वाले अखिलेश ही थे। फिर ऐसी कौन सी मजबूरी अखिलेश के सामने आ गई कि उनको मुख्तार अंसारी के परिवार को इतनी तवज्जो देनी पड़ी। इससे भी विरोधियों को उनके उपर हमला करने का मौका मिल गया। बीजेपी ने इस मुददे को काफी मजबूती के साथ उठाया।

    काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पूर्व प्रोफेसर रहे और राजनीतिक विश्लेषक कमलाकांत उपाध्याय कहते हैं कि,

    ''देखिए विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में अखिलेश यादव किसी तरह के भ्रम में नहीं पड़ना चाहते हैं। उन्होंने इन विवादों से अपने लिए एक लकीर खींचने का प्रयास किया है। अब्बाजान का विवाद हो या कल्याण सिंह की श्रद्धांजलि सभा में न जाना। दोनों ही मामलों में उन्होंने जिस तरह से उन्होंने अपना स्टैंड रखा उससे एक बात तो साफ है कि वह मुस्लिम समाज को किसी भी सूरत में नाराज नहीं होने देना चाहते। उनको लगता है कि मुस्लिम और यादव गठजोड़ से उनकी सरकार बन सकती है। लिहाजा ये तो कह सकते हैं कि ये जो फैसले ले रहें हैं उनका दूरगामी परिणाम होगा। अब इनके हक में होगा या उनके खिलाफ जाएगा ये कहना मुश्किल है।''

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