2024 के चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने बदली रणनीति, पार्टी के भीतर किया बड़ा बदलाव
आगामी लोकसभा चुनाव से पहले सभी विपक्षी दल अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। इस बीच समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक बुलाई है। माना जा रहा है कि इस बैठक में आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर रणनीति तैयार की जाएगी।
दरअसल समाजवादी पार्टी को मुख्य रूप से यादवों की पार्टी माना जाता है, लिहाजा पार्टी इस टैग से खुद को अलग करना चाहेगी और अन्य जातीय समीकरण को साधने की कोशिश करेगी। पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में जिस तरह से सपा को एक बार फिर से हार का मुंह देखना पड़ा था उसके बाद राज्य कार्यकारी समिति को भंग कर दिया गया था।

एक बार फिर से नई कमेटी का गठन किया गया है, इसमे 70 में से 30 पदाधिकारी गैर यादव ओबीसी हैं, जबकि पांच यादव पदाधिकारियों को इसमे जगह दी गई है। यहां तक कि शेड्यूल कास्ट के 8 सदस्य इसमे शामिल हैं, जोकि यादव से कहीं अधिक हैं। इस कार्यकारी समिती में यादवों को कम जगह दी गई है।
इसके अलावा पार्टी ने 12 मुस्लिम सदस्यों को भी इस कमेटी में जगह दी है। पार्टी ने जिस तरह से इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिम पदाधिकारियों को इसमे जगह दी है, माना जा रहा है कि वह एक बड़े मुस्लिम वोट को भी अपने साथ लाने की तैयारी में है।
प्रदेश राज्य कार्यकारी समिति में कुल 70 पदाधिकारी हैं, 48 सदस्य हैं, 62 विशेष आमंत्रित सदस्य हैं। प्रदेश के पदाधिकारियों की यीनिट की अगुवाई प्रदेश सपा अध्यक्ष नरेश उत्त पटेल करेंगे। उनके अलावा इसमे चार उपाध्यक्ष भी होंगे, तीन जनरल सेक्रेटरी, 61 सेक्रेटरी और एक ट्रेजरार होगा।
नरेश उत्तम ने बताया कि नई टीम को संतुलित रखने की कोशिश की गई है, हर वर्ग के नेता को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई है। लेकिन भाजपा सपा को लेकर यह प्रोपेगेंडा चलाती है कि हम सिर्फ एक वर्ग की पार्टी हैं। सपा ने हमेशा हर जाति और समुदाय के लोगों को प्रतिनिधित्व दिया है।
जिस तरह से अखिलेश यादव ने गैर यादवों को पार्टी में बड़ा प्रतिनिधित्व दिया है उसकी एक खास वजह यह है कि लोकसभा चुनाव से पहले ओम प्रकाश राजभर का सपा से अलग होकर भाजपा के साथ जाना।
सपा के गठबंधन में पिछले चुनाव में गैर यादवों का अच्छा वोट था, इसमे राष्ट्रीय लोक दल, एसबीएसपी, महान दल, अपना दल (कमेरवाड़ी), जनवादी सोशलिस्ट पार्टी शामिल थे। लेकिन राजभर के एनडीएम मे शामिल होने के बाद सपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। यहां तक कि महान दल ने भी अब अपना समर्थन बसपा को देने का फैसला लिया है।












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