भाई को टिकट देकर आजमगढ़ के चक्रव्यूह में फंसे अखिलेश, जानिए कैसे बढ़ेंगी मुश्किलें
लखनऊ, 7 जून: उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ और रामपुर में 23 जून को लोकसभा उपचुनाव के तहत मतदान होना है। समाजवादी पार्टी के चीफ अखिलेश यादव ने आजमगढ़ में अपने चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव पर दाव लगाया है। ऐसा कहा जा रहा है कि धर्मेंद्र भी इस सीट से उप चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे लेकिन अखिलेश की जिद्द के आगे उनको झुकना पड़ा। हालाकि आजमगढ़ की सियासत पर नजर डालें तो यादव v/s यादव की लड़ाई में इस सीट पर चाभी सवर्णों के हाथ ही रहेगी। सवर्णों का जिस तरफ झुकाव हुआ बाजी उसी के हाथ लगेगी।

धर्मेंद्र की उम्मीदवारी पर लोग उठा रहे सवाल
आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव एक तरह से हाई प्रोफाइल चुनाव बन गया है। बताया जा रहा है कि, स्थानीय लोग धर्मेंद्र की उम्मीदवारी से नाराज भी हैं। इसके पीछे खास वजह उनका स्थानीय न होना है। लोगों का कहना है कि अखिलेश और मुलायम सिंह यादव तक तो ठीक था लेकिन अब धर्मेंद्र की जगह किसी स्थानीय चेहरे को सामने लाना चाहिए था। धर्मेंद्र की आजमगढ़ में उतनी स्वार्यता नही है जितनी अखिलेश की थी। आजमगढ़ सीट पर भी अब सैफई परिवार कब्जा जमाना चाहता है।

बसपा के मुस्लिम कार्ड से बीजेपी को मिलेगा फायदा
भाजपा ने भोजपुरी स्टार दिनेश लाल यादव "निरहुआ" को इस सीट से उम्मीदवार बनाया गया है। खास बात यह है कि निरहुआ को 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने टिकट दिया था। तब उन्हें सपा प्रत्याशी अखिलेश यादव (अखिलेश यादव) मिले थे। 2.59 लाख वोटों से हारे हैं। हालांकि, उस समय सपा के साथ बसपा का गठबंधन था और उसका वोट सपा की ओर स्थानांतरित हो गया था। लेकिन इस बार स्थिति अलग है और बसपा ने मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की योजना भी तैयार की है।

बीजेपी और बीएसपी के चक्रव्यूह में सपा
सपा ने आजमगढ़ सीट से मुस्लिम प्रत्याशी गुड्डू जमाली को टिकट देकर आजमगढ़ में अखिलेश यादव को घेरने का कदम उठाया है। आपको याद होगा कि यूपी विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने करहल सीट को घेरा था। उसी रणनीति के तहत मैनपुरी, जिसके बाद अखिलेश यादव को करहल सीट पर कई रैलियां करनी पड़ीं और चुनाव प्रचार के लिए सपा संरक्षक मुलायम सिंह को मैदान में उतारा गया। उसके बाद भी अखिलेश यादव एकतरफा जीत दर्ज नहीं कर सके।

बसपा के मुस्लिम कार्ड से सपा की राह आसान नहीं
बसपा ने रामपुर सीट से उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है। जबकि उन्होंने आजमगढ़ सीट से गुड्डू जमाली को टिकट देकर सपा के मुसलमानों को बढ़ाया है। गुड्डू जमाली बड़े कारोबारी हैं और बसपा प्रमुख मायावती ने उन पर भरोसा जताया है। राज्य में चर्चा है कि मुस्लिम सपा से नाराज हैं और ऐसे में मुस्लिम वोट बैंक का झुकाव बसपा की ओर हो सकता है. इसी को देखते हुए बीजेपी ने निरहुआ को टिकट दिया है।

आजमगढ़ में सपा लगातार जीत रही है
समाजवादी पार्टी यहां से पांच बार आजमगढ़ सीट पर मुस्लिम-यादव फैक्टर से जीती है। जबकि बसपा भी अब तक चार बार मुस्लिम-दलित गठबंधन से जीत चुकी है। हालांकि अभी तक इस सीट पर बीजेपी को सिर्फ एक बार जीत मिली है। दरअसल, 2009 में बसपा से अलग होकर बीजेपी में शामिल हुए रमाकांत यादव ने इस सीट पर कमल खिलाया था। लेकिन उसके बाद और उससे पहले इस आसन पर कभी कमल नहीं खिल पाया। 2014 में यह सीट मुलायम सिंह यादव ने जीती थी और उसके बाद 2019 में इस सीट पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जीत हासिल की थी।

जानिए क्या है जाति समीकरण
आजमगढ़ संसदीय सीट की बात करें तो अन्य जातियों पर मुस्लिम-यादव का दबदबा है और इसे आमतौर पर सपा का पारंपरिक वोट माना जाता है। जिससे इस सीट पर अब तक सपा ने सबसे ज्यादा जीत दर्ज की है। इस सीट पर यादव-मुस्लिम की हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी है। जबकि दलित 22, गैर यादव ओबीसी 21 और सवर्ण 17 प्रतिशत हैं। तो इस बार बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवार उतार कर सपा की राह में कांटे लगा दिए हैं। क्योंकि जीत के लिए दलितों के 22 फीसदी वोट बेहद अहम हैं।












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