अखिलेश ने शिवपाल के घर जाकर धोए दाग! सपा में अपनी लीडरशिप और यूपी चुनाव में खुद को किया मजबूत
लखनऊ, 17 दिसंबर। यूपी चुनाव में रालोद, सुभासपा, जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट), महान दल, अपना दल (कमेरावादी) से गठबंधन करने वाले सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कहा था कि एक और छोटी पार्टी है जिसके साथ गठबंधन होना है। जब 16 दिसंबर को अखिलेश खुद ही शिवपाल यादव से मिलने उनके आवास पर पहुंच गए तब पता चला कि वह छोटी पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी है। बहरहाल, चाचा और भतीजा साथ मुस्कुराते दिखे। अखिलेश ने गठबंधन होने का ऐलान भी कर दिया। सपा पर वर्चस्व को लेकर 2017 में अखिलेश और मुलायम-शिवपाल आमने-सामने हो गए थे। आखिरकार अखिलेश यादव पिता मुलायम का तख्तापलट कर खुद सपा के मुखिया बन गए और इसमें चाचा रामगोपाल यादव ने साथ दिया था। 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुए घटनाक्रम के बाद मुलायम और अखिलेश के बीच बातचीत भी बंद हो गई थी। मुलायम से बगावत का नुकसान भी अखिलेश को उठाना पड़ा था। मुलायम ने अखिलेश के बारे में कह दिया था कि जो अपने बाप का नहीं हो सका वो किसी का नहीं हो सकता। भाजपा के नेता मुलायम की इस बात के जरिए अभी तक अखिलेश पर वार करते रहे हैं। शिवपाल के साथ मेल कर अखिलेश ने एक तरह से अपने ऊपर लगे उस दाग को धो लिया है।

शिवपाल को साथ लेकर अखिलेश ने विरोधियों से छीना मुद्दा
सीएम योगी भाषणों में कई बार अखिलेश यादव पर यह कहकर निशाना साध चुके हैं कि जो अपने बाप-चाचा का नहीं हुआ वो जनता का क्या होगा। सितंबर 2018 में पिछड़ा वर्ग मोर्चा सम्मेलन में सीएम योगी अखिलेश को बाप को कैद रखनेवाला औरंगजेब भी कह चुके हैं। सीएम योगी ही नहीं, भाजपा के कई नेता लगातार इस मुद्दे को लेकर अखिलेश पर हमला बोलते रहे। साल 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी में लगे अखिलेश ने जब एक रैली में सीएम योगी पर यह कहकर प्रहार किया कि परिवार वाला ही परिवार वालों का दर्द समझ सकता है तो जवाब में भाजपा ने मुलायम का वही वीडियो ट्वीट कर दिया जिसमें वे यह बयान दे रहे हैं कि जो अपने बाप का नहीं हुआ वो किसी का नहीं हो सकता है। मुलायम को इस बात का दर्द था कि अखिलेश ने भाई शिवपाल को पार्टी में किनारे कर दिया था। इसके बाद 2018 में शिवपाल ने अपनी पार्टी बना ली थी। मुलायम कुनबे में फूट का खामियाजा सपा भुगत रही थी। 2017 विधानसभा चुनाव के बाद 2019 लोकसभा चुनाव में भी पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा। साल 2022 के चुनाव के लिए अखिलेश अपने पक्ष में वोटों को एकजुट करने के लिए छोटे दलों के साथ मिलकर सियासी समीकरण बिठाने में जुटे हैं। ऐसे में अगर वे शिवपाल का साथ नहीं लेते तो फिर एक बार फिर भाजपा उन पर बाप के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाती रहती। चाचा शिवपाल को साथ लेकर अखिलेश अब विरोधियों को एक तरफ जवाब दे पाएंगे, वहीं सपा के वोटों को बिखरने से बचा सकेंगे।

शिवपाल को साथ लेने से मजबूत हुए अखिलेश
समाजवादी पार्टी को खड़ा करने में मुलायम सिंह यादव के साथ भाई शिवपाल यादव का भी बड़ा योगदान था। पिता और चाचा को पार्टी में हाशिए पर डाल देने के बाद अखिलेश की छवि को धक्का लगा था। शिवपाल अपनी पार्टी का सपा में विलय करने के लिए भी तैयार हैं। अगर शिवपाल अखिलेश के खिलाफ चुनाव लड़ते तो वो सपा को नुकसान ही पहुंचाते। 2022 के चुनाव में भाजपा को हराने के लिए अखिलेश की कोशिशों के सामने शिवपाल बहुत बड़ा खतरा थे। वैसे भी इस बार अखिलेश अपना हर दांव बहुत सोच-समझकर चल रहे हैं। ऐसे में वे शिवपाल से दूरी बनाए रखने का नुकसान झेलने की स्थिति में नहीं थे। अगर शिवपाल की पार्टी का विलय सपा में हो जाता है तो एक बार फिर यादव वोटबैंक को एकजुट किया जा सकता है। अखिलेश को उम्मीद है कि मुसलमान इस बार उनको ही वोट करेंगे। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक, करीब 60-70 सीटों पर शिवपाल का असर है। शिवपाल के साथ आने से अखिलेश और सपा पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में है, ऐसा माना जा रहा है।

सपा में अखिलेश की लीडरशिप के लिए शिवपाल हैं बूस्टर डोज
2017 में जब सपा में लीडरशिप को लेकर अखिलेश और मुलायम-शिवपाल के बीच तनातनी हुई थी तो आखिरकार अखिलेश इसमें जीते तो थे लेकिन विरोधी उनको औरंगजेब कहने लगे थे। उन पर यह आरोप लग रहे थे कि वो पिता-चाचा को साथ नहीं लेकर चल सके तो किसी और को क्या जोड़ पाएंगे? 2022 के चुनाव में अखिलेश अलग ही तेवर में दिख रहे हैं। इसमें उन्होंने अपने साथ अलग-अलग जाति समूहों का नेतृत्व करने वाले नेताओं को अपने साथ जोड़ा है। चाचा शिवपाल को साथ जोड़ने के बाद सपा में उनकी लीडरशिप को पहले से ज्यादा मान्यता मिलेगी। शिवपाल अखिलेश की लीडरशिप के लिए बूस्टर डोज हैं। शिवपाल से जाकर अखिलेश मिले, उनके पैर छुए, उनके साथ खाना खाया। शिवपाल ने उनको गले लगाया। इन सबके जरिए एक तरह से अखिलेश विरोधियों को मैसेज दे रहे हैं कि उन्होंने चाचा को भी साथ जोड़ लिया है।

शिवपाल के साथ होने से अखिलेश के सामने चुनौतियां
अखिलेश के एक और चाचा रामगोपाल यादव सपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं और 2017 के तख्तापलट में उन्होंने ही अखिलेश का साथ दिया था। मुलायम के समय शिवपाल और रामगोपाल दोनों ही पार्टी में बहुत प्रभावशाली थे। अब अखिलेश के समय में भी दोनों साथ हैं तो यह देखने वाली बात होगी कि दोनों चाचाओं के साथ वे कैसे तालमेल बिठा पाते हैं। शिवपाल समर्थक ज्यादा सीटों की दावेदारी करेंगे, उनको गठबंधन में साथ लेकर चलना भी अखिलेश के सामने बड़ी चुनौती है। शिवपाल कई बार कह चुके हैं उनको सम्मान चाहिए ऐसे में हो सकता है कि गठबंधन के कई उम्मीदवार साइकिल सिंबल पर ही चुनाव लड़ें। बहरहाल, शिवपाल और अखिलेश के साथ होने से दोनों के बीच बंटे समर्थकों के एकजुट होने की राह आसान हो गई है। साथ ही, ऐसी सीटें जहां शिवपाल अखिलेश को नुकसान पहुंचा सकते थे, उससे भी पार्टी बच जाएगी। यही चाचा-भतीजे के साथ आने से 2022 में सपा को होने वाला सबसे बड़ा फायदा है, और भाजपा के लिए झटका।












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