यूपी में ओवैसी को वोट मिले नोटा से भी कम, बीजेपी की जीत पर संजय राउत के दावों में कितना दम ? पूरी पड़ताल
लखनऊ, 11 मार्च: उत्तर प्रदेश में 1952 के बाद पहली बार कोई मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद दोबारा सीएम की कुर्सी पर बैठने जा रहा है। लेकिन, बीजेपी की यह शानदार कामयाबी उसकी पुरानी सहयोगी शिवसेना को रास नहीं आ रही है। पार्टी नेता संजय राउत ने भाजपा की इस जीत का सेहरा बहुजन समाज पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी को दिया है और कटाक्ष के तौर पर उन्हें भारत रत्न देने की जुमलेबाजी कर दी है। सवाल है कि राउत ने जो कुछ कहा है, वह खालिस राजनीति से प्रेरित है या फिर वह किसी तथ्य और आंकड़ों से प्रभावित है।

मायावती और ओवैसी को भारत रत्न देना पड़ेगा-राउत
शिवसेना नेता संजय राउत ने यूपी चुनाव पर शुक्रवार को एक ऐसा बयान दिया है, जिसकी सच्चाई की पड़ताल जरूरी हो गई है। हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि केंद्र की भाजपा सरकार से खुन्नस खाए बैठे राउत ने तथ्यों के आधार पर बयान दिया है या फिर वह राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं? उन्होंने कहा है, 'बीजेपी को बड़ी जीत मिली है, उत्तर प्रदेश उनका राज्य था फिर भी अखिलेश यादव की सीटें बढ़ी हैं। भारतीय जनता पार्टी की जीत में मायावती और ओवैसी का योगदान है। इन सबको पद्मविभूषण और भारत रत्न देना पड़ेगा।'

बसपा के जो वोट कम हुए, सपा के बढ़ गए
पहले हम 2022 में बीजेपी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी को मिले कुल वोटों को देख लेते हैं। साथ ही साथ घेरे में 2017 के वोट शेयर का भी जिक्र कर रहे हैं। बीजेपी को इस बार 41.29% (2017- 39.67%) वोट मिले हैं। यानि उसके कुल वोट शेयर में 1.62% का इजाफा हुआ है। लेकिन, समाजवादी पार्टी को इस बार 32.06% (2017-21.82% ) वोट मिले हैं। मतलब, 10.24% वोटों की ऊंची छलांग। जब तक बसपा के वोट शेयर में हुई कमी को नहीं देखेंगे, तब तक संजय राउत का क्या, किसी का भी कंफ्यूजन दूर नहीं होगा। बीएसपी को इस बार महज 12.88% (2017- 22.23%) वोट मिले हैं। मतलब, मायावती को 9.35% वोट का नुकसान हुआ है। बीएसपी के बाद अगर किसी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है तो वह कांग्रेस है। पार्टी को इस बार सिर्फ 2.33% (2017-6.25%) वोट मिले हैं, जो आजादी के बाद सबसे पुरानी पार्टी होने का दावा करने वाले दल का सबसे खराब प्रदर्शन है। इसके 3.92% वोट घटे हैं। यानि, 'हाथी' और 'हाथ' को हुए नुकसान का असल फायदा 'साइकिल' को मिलता दिख रहा है।

सुरक्षित सीटों पर बीजेपी को भारी नुकसान, सपा बड़े फायदे में
अगर भाजपा की ऐतिहासिक जीत में बसपा के योगदान का दावा किया गया है तो यूपी में अुनसूचित जातियों और जनजातियों के लिए रिजर्व सीटों पर हुए मतदान का विश्लेषण करना भी जरूरी है। सूबे की ऐसी कुल 86 सुरक्षित सीटों में 2022 में बीजेपी का वोट शेयर 39%(2017- 41.7%) रहा है और उसे सिर्फ 52 (2017- 73) सीटें मिली हैं। वहीं समाजवादी पार्टी को इस बार यहां 30% (2017- 22.6%)वोट मिले हैं और 23 (2017-10) सीटें उसके खाते में गई हैं। मतलब, यहां अखिलेश यादव को जबर्दस्त फायदा और बीजेपी को बड़ा नुकसान हुआ है। यह फायदा और नुकसान किसकी कीमत पर हुआ है? बहुजन समाज पार्टी की कीमत पर। क्योंकि, मायावती की पार्टी को इन सीटों पर 2022 में सिर्फ 13.6%(2017- 23.9%) वोट मिले हैं और वह 1 (2017-2) सीट पर ही जीत पाई है, जो पूरे प्रदेश में उसकी एकमात्र कामयाबी है।

मुस्लिम-बहुल सीटों पर भी सपा को जबर्दस्त सफलता
अब प्रदेश की 59 मुस्लिम-बहुल विधानसभा सीटों पर इन दलों के प्रदर्शन पर नजर डालते हैं। 2022 के चुनाव में बीजेपी को यहां 39.3% (2017- 39.1%) वोट के साथ 22 (2017-39) सीटें ही मिली हैं। जबकि, सपा को 39.1% (2017- 30.7%) वोट और 34 (2017-17) सीटें मिली हैं। अब बीएसपी के प्रदर्शन को देखेंगे तो अंदाजा लगेगा कि असल फायदा तो समाजवादी पार्टी को ही मिला है। बीएसपी को इस बार इन सीटों पर कुल 10.2% (2017-18.3%) वोट मिले हैं और पिछली बार की तरह कोई सीट नहीं मिली है। लेकिन, उसका करीब 8% वोट शेयर जरूर खिसक गया है।

ओवैसी की पार्टी का यूपी में नोटा से भी खराब प्रदर्शन
अब शिवसेना के बड़बोले राज्यसभा सांसद राउत के दावे के मुताबिक रही हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी को भाजपा की जीत में सहयोग करने के लिए भारत रत्न देने की बात तो उसकी भी छानबीन कर लेना जरूरी है। ओवैसी ने यूपी चुनाव में मुस्लिम बहुल 100 सीटों पर अपना प्रत्याशी उतारा था। इनमें से लगभग सारी सीटों पर इसके प्रत्याशियों की जमानतें जब्त हो गईं। उदाहरण के लिए मुसलमानों के सबसे बड़े केंद्र के रूप में मशहूर देवबंद को ही लेते हैं। यहां बीजेपी के स्थानीय उम्मीदवार ब्रिजेश 93,890 वोट लाकर चुनाव जीते हैं। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी सपा के कार्तिकेय राणा को 86,786 वोट मिला है। जबकि, एआईएमआईएम के उम्मीदवार उमेर मदनी को 3,501 इतना वोट मिला। अगर यह सारा का सारा वोट समाजवादी पार्टी को मिल भी जाता तो भी, वह नहीं जीत सकती थी। हकीकत तो ये है कि ओवैसी बिहार जैसे प्रदर्शन की उम्मीद लगाकर यूपी जरूर आए थे, लेकिन उन्हें नोटा को मिले 0.69% वोट से भी कम 0.49% वोट मिले हैं।












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