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भारत को औरों से ज्यादा राहत, समझौते के बाद केस वापस लेगा अमेरिका

Provided by Deutsche Welle

नई दिल्ली, 25 नवंबर। अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि ने कहा है कि भारत के खिलाफ व्यापारिक प्रतिकार का मामला रद्द किया जा रहा है. दोनों देशों के बीच वैश्विक कर संद्धि पर हुए समझौते के बाद यह फैसला लिया गया. साथ ही, भारत डिजिटिल सर्विस टैक्स वापस लेने पर भी सहमत हो गया है.

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने कहा है कि भारत और अमेरिका के वित्त मंत्रालयों के बीच उन्हीं शर्तों पर समझौता हुआ है, जो ऑस्ट्रिया, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, स्पेन और तुर्की के साथ लागू होती हैं. हालांकि भारत के मामले में समझौता लागू करने की तारीख थोड़ी बढ़ा दी गई है.

भारत को राहत

भारत और अमेरिका के बीच हुआ समझौता उसी समझौते के तहत हुआ है जिस पर अक्टूबर में 136 देशों ने सैद्धांतिक सहमति जताई थी. 8 अक्टूबर को हुए इस समझौते में ये देश इस बात पर सहमत हुए थे कि वैश्विक कंपनियों से कम से कम 15 प्रतिशत कॉरपोरेट टैक्स उस देश में लिया जाना चाहिए, जहां वे काम कर रही हैं. साथ ही उन्हें कुछ कर अधिकार दिए जाने चाहिए.

ये देश इस बात पर भी सहमत हुए थे कि 2023 में विकसित देशों के समूह (OECD) द्वारा टैक्स डील लागू किए जाने से पहले नया डिजिटल टैक्स नहीं लगाया जाएगा. चूंकि अमेरिकी कंपनियों गूगल, फेसबुक और अमेजॉन आदि के साथ इन सात देशों के पहले से हुए समझौते भी हैं तो इस बारे में कई कदम उठाए जाने की जरूरत होगी.

हाल ही में अमेरिका की व्यापार प्रतिनिधि कैथरीन टाइ ने भारत की यात्रा की थी. इस दौरान उनकी भारत के वाणिज्य मंत्री से लंबी बातचीत हुई थी, जिसके बाद यह समझौता हुआ है. इस समझौते की शर्तें ओईसीडी के अन्य देशों के साथ भी लागू होगीं.

भारत और अमेरिका के बीच हुए समझौते में यह बात भी शामिल है कि जब तक ग्लोबल टैक्स डील लागू नहीं हो जाती, तब तक सभी देश डिजिटल सर्विस टैक्स लेना जारी रख सकते हैं. लेकिन तुर्की और अन्य यूरोपीय देशों के मामले में अगर यह टैक्स 'वैश्विक कर' से ज्यादा है, तो कंपनी जनवरी 2022 के बाद कंपनी जितना अतिरिक्त कर देती है, उतना 'वैश्विक कर समझौता' लागू हो जाने के बाद उसे क्रेडिट मिल जाएगा. अमेरिका ने कहा कि भारत के मामले में यह तारीख जनवरी 2022 से बढ़ाकर 1 अप्रैल 2022 कर दी गई है.

क्या है वैश्विक ग्लोबल टैक्स

अभी जो वैश्विक कर व्यवस्था लागू है, वह 1920 के दशक में बनाई गई थी. इसे बदलने पर कई साल से चर्चा चल रही थी और हाल ही में अमेरिका ने 15 फीसदी टैक्स का यह प्रस्ताव पेश किया था.

इसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों से एक निश्चित न्यूनतम टैक्स लेने और उसके लिए विशेष नियम बनाने की बात है. ये नियम सुनिश्चित करेंगे कि कंपनियां कितना टैक्स देंगी और किस देश में देंगी. यह टैक्स दुनिया की 100 सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनियों पर लगाया जाएगा.

इसका अर्थ होगा कि कंपनियों को एक न्यूनतम टैक्स तो देना ही होगा. अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसकी दर 15 फीसदी रखने का सुझाव दिया था जिसे बाकी देशों ने मान लिया. यानी यदि कोई कंपनी किसी देश में 15 फीसदी से कम टैक्स दे रही है, तो बाकी का टैक्स उसे टॉप-अप के तौर पर देना होगा.

यह व्यवस्था कर-पनाह कही जाने वाली उस व्यवस्था को तोड़ने की कोशिश है, जिसके तहत कंपनियां अपना मुनाफा सबसे कम टैक्स लेने वाले देशों में दिखाकर अधिक कर देने से बच जाती हैं. कर-पनाह उन देशों को कहा जाता है, जो कम टैक्स का लालच देकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने यहां कारोबार करने के लिए आमंत्रित करते हैं.

वीके/एए (रॉयटर्स, एएफपी)

Source: DW

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