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स्टैन स्वामी की मौत पर संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ भी दुखी

नई दिल्ली, 07 जुलाई। भीमा-कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किए गए पादरी स्टैन स्वामी का सोमवार को हिरासत में निधन हो गया. 84 वर्ष के स्वामी भारत की जेल में बंद सबसे उम्रदराज व्यक्ति थे और अपनी जमानत याचिका पर सुनवाई का इंतजार कर रहे थे. एनआईए पर उन्हें अनुचित रूप से गिरफ्तार करने और जेल प्रशासन पर उनके स्वास्थ्य को नजरअंदाज करने के आरोप लगते आए हैं.

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयुक्त की प्रवक्ता लिज थ्रोसेल ने एक बयान जारी कहा, "एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और पादरी स्टैन स्वामी की मुंबई में कल हुई मौत पर हम दुखी और व्याकुल हैं."

un international bodies express concern on stan swamys death

थ्रोसेल ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार आयुक्त मिशेल बैचलेट और संयुक्त राष्ट्र के अन्य निष्पक्ष विशेषज्ञ फादर स्टैन और इससे संबंधित मामलों में गिरफ्तार 15 अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिहाई का आग्रह भारत सरकार से बार-बार करते रहे हैं.

उन्होंने कहा, "हाई कमिश्नर ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ इस्तेमाल को लेकर भी चिंता जाहिर कर चुकी हैं." फादर स्टैन को भारत की जांच एजेंसी एनआईए ने अक्टूबर 2020 में गिरफ्तार किया था और उन पर यूएपीए लगाया गया था.

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रांची के नामकुम स्थित अपने घर से गिरफ्तार किए जाने के वक्त भी फादर स्टैन पार्किंसंस और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित थे. उन्हें मुंबई के तलोजा केंद्रीय जेल में रखा गया जहां उन्होंने आठ महीने हिरासत में बिताए. इस दौरान उन्होंने और उनके समर्थकों ने कई बार उनके साथ अमानवीय किए जाने व्यवहार के आरोप लगाए.

अमानवीय व्यवहार के आरोप

गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों बाद स्वामी ने विशेष एनआईए अदालत से आग्रह किया था कि उन्हें पानी पीने के लिए एक सिपर और स्ट्रॉ दिलवा दिया जाए क्योंकि वह पार्किंसंस रोग से पीड़ित थे और गिलास उठाकर पानी नहीं पी पा रहे थे. इस आग्रह को मानने में अधिकारियों ने करीब दो महीने लगा दिए.

फादर स्टैन की ओर से दो बार जमानत की याचिका दर्ज की गई, जिन्हें खारिज कर दिया गया. पहली बार तो विशेष एनआईए अदालत ने उनकी जमानत की याचिका को खारिज करने के लिए भी तीन महीने का समय लिया. नवंबर 2020 में दी गई जमानत याचिका मार्च 2021 में खारिज की गई. इस दौरान उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता रहा.

मई में उन्होंने एक बार फिर जमानत के लिए याचिका दी, और अदालत से कहा कि उनकी हालत इतनी खराब है कि उन्हें जेल से जल्द निकाला ना गया तो वह मर भी सकते हैं. उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई सुनवाई में अदालत को बताया कि जब उन्हें पहली बार जेल लाया गया था, तब कम से कम उनका शरीर मूल रूप से काम कर रहा था, लेकिन जेल में रहते हुए उनकी सुनने की शक्ति और कम हो गई है और वह मूलभूत काम करने में भी लाचार हैं.

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मई 2021 में जेल में ही स्वामी कोविड-19 से संक्रमित हो गए, जिसके बाद 28 मई को बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया था. 4 जुलाई को अस्पताल में ही उनकी हालत और खराब हो गई और उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया था. 7 जुलाई को उनकी जमानत याचिका पर दोबारा सुनवाई होनी थी, लेकिन 5 जुलाई को ही उनका निधन हो गया.

सरकार की आलोचना

स्वामी के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर भारत सरकार की आलोचना हो रही है. मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिवेदक मैरी लॉलर और यूएन कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजस फ्रीडम की अध्यक्ष नदीन माएन्जा ने कहा कि स्वामी को फर्जी आरोपों के तहत गिरफ्तार करके हिरासत में रखा गया.

यूरोपीय संघ की विशेष मानवाधिकार प्रतिनिधि एमॉन गिलमर ने भी स्वामी की मौत पर शोक जताया है. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, "भारतः मैं यह सुनकर बहुत दुखी हूं कि फादर स्टैन नहीं रहे. आदिवासियों के अधिकारों के रक्षक. वह नौ महीने से हिरासत में थे. यूरोपीय संघ बार-बार यह मामला उठाता रहा था."

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार आयुक्त की प्रवक्त लिज थॉर्ले ने कहा, "हम एक बार फिर जोर देकर भारत सरकार से मांग करते हैं कि किसी को भी अभिव्यक्ति की आजादी और शांतिपूर्ण तरीके से जमा होने के मूलभूत अधिकारों के इस्तेमाल के लिए हिरासत में नहीं रखा जाना चाहिए."

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भारत में भी कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों ने स्वामी की मौत पर शोक और आक्रोश जारी किया है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्विटर पर लिखा कि स्टैन स्वामी न्याय और मानवीय व्यवहार के हकदार थे.

भारत सरकार की प्रतिक्रिया

भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने इस आलोचना का जवाब देते हुए कहा है कि स्वामी को कानूनी प्रक्रिया के तहत ही हिरासत में रखा गया था और 'उनके खिलाफ आरोपों की प्रकृति' के कारण ही उनकी जमानत याचिकाएं खारिज हुईं.

विदेश मंत्रालय ने कहा कि "अधिकारी कानूनों के उल्लंघन के खिलाफ ही कार्रवाई करते हैं और किसी के कानून के तहत अपने अधिकारों के इस्तेमाल के लिए नहीं. और अधिकारियों की कार्रवाई पूरी तरह से कानून-सम्मत होती है."

मंत्रालय ने कहा, "भारत एक लोकतांत्रिक और सैंवाधानिक देश है, जिसमें एक निष्पक्ष न्यायपालिका है, राज्यों और राष्ट्रीय स्तर की कई मानवाधिकार संस्थाएं हैं जो उल्लंघनों पर नजर रखती हैं, निष्पक्ष मीडिया है और एक सक्रिय व मुखरित नागरिक समाज भी है. भारत अपने सभी नागरिकों के मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है."

Source: DW

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