Congress Chintan Shivir: क्या कांग्रेस के नेता अब ट्रेनिंग स्कूल में तैयार होंगे ?
उदयपुर, 13 मई। उदयपुर नवसंकल्प चिंतन शिविर में कांग्रेस को मजबूत करने पर तीन दिनों तक विचार-विमर्श होगा। राहुल गांधी शुक्रवार को ट्रेन से उदयपुर पहुंचे। इसके पहले जब ट्रेन चित्तौढ़गढ़ में थी तब राहुल गांधी पार्टी के नेताओं से मिलने के लिए स्टेशन पर उतरे थे। उनके चेहरे पर मास्क था और वे हाथ जोड़ कर सभी का अभिवादन कर रहे थे। एक उत्साही नेता ने कहा, आप विजयी हों, एक दिन प्रधानमंत्री बनें और देश की सेवा करें।

इस मंगलकामना पर उन्होंने सिर हिला कर उक्त नेता के प्रति आभार प्रगट किया। एक तरह से मौन सहमित दर्शायी। कांग्रेस कार्यकर्ता जोश में थे। राहुल गांधी ने आधे बांह की सफेद शर्ट और पतलून पहन रखी थी। पार्टी के नेता नारे लगा कर उनका जयघोष कर रहे थे। चिंतन शिविर में चाहे जो भी निर्णय लिया जाय लेकिन एक बात पहले साफ है। राहुल गांधी को दोबारा अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी में जबर्दस्त माहौल बनाया जा रहा है। कांग्रेस का मानना है कि वह सबसे पुरानी पार्टी है। उसका प्रभाव कम हुआ है लेकिन खत्म नहीं हुआ है। उम्मीदों का चिराग जरूर रौशन होगा। देर-सबेर वह लोगों का भरोसा जीत लेगी और उसकी वापसी होगी।
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क्या ट्रेनिंग स्कूल में तैयार होंगे कांग्रेस के नेता ?
कांग्रेस केवल एक पार्टी नहीं है। वह देश की विरासत है। एक ऐतिहासिक परम्परा है। गांधी जी ने सवनिय अवज्ञा और सत्याग्रह के सिद्धांत से कांग्रेस को एक वटवृक्ष बनाया था। देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद और पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस की राजनीति को बुलंदी पर पहुंचाया। लेकिन अब यह कांग्रेस लगातार हार से घबरा गयी है। इस घबराहट में वह अपनी ऐतिहासिक परम्परा को बदलना चाहती है। कांग्रेस पहले जनता के दिलों में राज करती थी। आज ऐसे लोगों की संख्या कम जरूर हो गयी है लेकिन फिर भी गांव-गांव में उसके चाहने वालों की कमी नहीं है। लेकिन अब कांग्रेस जनभावना से अधिक तकनीक को तवज्जो देना चाहती है। वह रिसर्च मेथडोलॉजी और प्रबंधन सिद्धांतों के आधार पर पार्टी को मजबूत करना चाहती है। तभी तो कांग्रेस ‘लीडर्स ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट' खोलने पर विचार कर रही है। चर्चा है कि अब चुनावी रणनीति के लिए पार्टी में एक अलग इकाई होगी और इसके लिए विशेष महासचिव की नियुक्ति की जाएगी। वैसे अभी कुछ तय नहीं हुआ है। लेकिन वरिष्ठ नेता इन बातों की चर्चा कर रहे हैं। तो क्या अब कांग्रेस के नेता इंस्टीट्यूट में तैयार होंगे जिसके लिए ट्रेनिंग स्कूल खोलने पर विचार किया जा रहा है। गांधी जी की कांग्रेस अब कौन-कौन सा दिन देखेगी ?

योग्य लोगों की कमी नहीं, मौका तो दीजिए !
चुनावी राजनीति में कांग्रेस कैसे सफल होगी ? ये एक बहुत बड़ा सवाल है। राज्यों में कांग्रेस की सत्ता लगातार सिकुड़ रही है। हाल ही में पंजाब में उसकी करारी हार हुई। जब मुख्यमंत्री दो-दो जगह से चुनाव हार जाए तो कांग्रेस के लिए चिंतन जरूरी है। जब तक कांग्रेस जीत रही थी तब तक गांधी परिवार के नेतृत्व पर कोई सवाल नहीं था। लेकिन जब पार्टी लगातार चुनाव हार रही है तब तो कुछ नया सोचना होगा। अभी भी राहुल गांधी को ही अध्यक्ष बनाये जाने की चर्चा हो रही है ? जिसने भी राहुल गांधी या सोनिया गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाया उसे कांग्रेस में दरकिनार कर दिया गया। 1964 में जब जवाहर लाल नेहरू का निधन हुआ था तब यह पूछा जा रहा था कि अब नेहरू के बाद कौन ? कौन है जो नेहरू जी की जगह लेगा ? तब लालबहादुर शास्त्री ने शांत भाव से आगे बढ़ कर यह जिम्मेदारी उठायी। वे नेहरू जी से बेहतर शासक साबित हुए। नेहरू जी 1962 में चीन से युद्ध हार चुके थे। शास्त्री जी ने 1965 में पाकिस्तान को धूल चटा कर देश की शान बढ़ायी थी। मतलब कांग्रेस में योग्य नेताओं की कोई कमी नहीं है। बस जरूरत है उन पर भरोसा करने और मौका देने की। आज भी कांग्रेस में योग्य नेता मौजूद हैं। लेकिन वे हाशिए पर हैं। गांधी परिवार के प्रति वफादारी ही अब सच्चे कांग्रेसी की निशानी बन गयी है। जब तक यह स्थिति नहीं बदलेगी, कांग्रेस का भला नहीं होने वाला। फिर चिंतन शिविर से क्या फायदा ?

हाय रे कांग्रेस की मजबूरियां !
चिंतन शिविर में क्या होता है ? आत्ममंथन होता है। कमियों पर चर्चा होती है। उसे सुधारने के लिए नीतियां बनती हैं। लेकिन जब कमियों को छिपाएंगे या सच बोलने से कतराएंगे तो फिर आत्ममंथन कैसे होगा ? चर्चा है कि कांग्रेस ‘एक परिवार, एक टिकट' देने की नीति अपनाने वाली है। लेकिन गांधी परिवार को इस नीति के दायरे में नहीं लाया जाएगा। जब तक नियम में एकरूपता और पारदर्शिता न हो, उसको बनाने से क्या फायदा ? आम कांग्रेसी के लिए अलग नियम और गांधी परिवार के लिए अलग नियम ? गांधी परिवार की परिक्रमा करने से कांग्रेस को क्या हासिल हुआ ? 2013 में कांग्रेस की सरकार थी। अगले साल चुनाव होना था। कांग्रेस जीत की हैट्रिक लगाना चाहती थी। इस पर विचार विमर्श के लिए कांग्रेस ने जयपुर में चिंतन शिविर का आयोजन किया था। 18 जनवरी से 20 जनवरी 2013 तक बैठक चली थी। इस शिविर में भी कांग्रेस की चर्चा का केन्द्र सोनिया गांधी और राहुल गांधी ही थे। उनके महिमा मंडन में ही अधिकतर समय खर्च हुआ। राहुल गांधी को महासचिव से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया था। लेकिन इन सबका क्या फायदा हुआ ? 2014 में कांग्रेस बुरी तरह चुनाव हार गयी। 2019 में जब कांग्रेस चुनाव हार गयी तो राहुल गांधी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। लेकिन हाय रे कांग्रेस की मजबूरियां ! वह अभी तक स्थायी अध्यक्ष नहीं खोज सकी है। माना जा रहा है कि उदयपुर चिंतन शिविर में कांग्रेस की यह तलाश पूरी हो जाएगी।
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