T-20 World Cup में भारत का पावर प्ले : 31/3, 32/1, 33/2, 37/1, 38/1- तो क्या धोखा थी ‘ठोको’ रणनीति ?

भारतीय टीम के क्रिकेटर उस कलाकार की त मंच पर तो धांसू प्रदर्शन करता है लेकिन बड़े मंच पर उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। इस साल टीम इंडिया ने टी-20 के द्विपक्षीय सीरीज में जीत का वर्ल्ड रिकॉर्ड बना दिया।

भारतीय टीम के क्रिकेटर उस कलाकार की तरह हैं जो छोटे मंच पर तो धांसू प्रदर्शन करता है लेकिन बड़े मंच पर उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। इस साल टीम इंडिया ने टी-20 के द्विपक्षीय सीरीज में जीत का वर्ल्ड रिकॉर्ड बना दिया। रोहित शर्मा की कप्तानी में इस साल भारत में 21 टी-20 मैच जीते। पाकिस्तान के पिछले रिकॉर्ड (20 जीत) को तोड़ दिया। लेकिन ये जीत भला किस काम की जब आप विश्वकप के सेमीफाइनल में घुटने टेकने पर मजबूर हो गये। जीत का रिकॉर्ड बनाने वाली टीम को क्या ऐसी शर्मनाक हार मिलनी चाहिए ? इतनी जीत के बाद ऑस्ट्रेलिया पहुंचने वाली टीम का क्या यही मनोबल होना चाहिए ? टीम इंडिया के सारे सूरमा मिट्टी के शेर साबित हुए। ये टीम सिर्फ दो देशों के मुकाबले जीत सकती है। विश्वस्तर की बहुराष्ट्रीय प्रतियोगिता में इसके हाथ-पांव फूल जाते हैं। टीम इंडिया ने पावर प्ले की रणनीति के नाम पर जो फरेब किया उससे भारत के खेल प्रेमी बहुत निराश हैं।

T-20 World Cup

पहली गेंद से 'ठोको' रणनीति का धोखा !

ये फरेब नहीं तो क्या है ? विश्वकप के पहले भारत ने 'पहली गेंद से ठोको' रणनीति का खूब प्रचार किया था। रोहित शर्मा और राहुल द्रविड़ ने कहा, विकेट गिरे तो गिरे लेकिन पावर प्ले में चौके-छक्के लगाएंगे। याद कीजिए भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच नागपुर में खेला गया टी-20 मैच। बारिश की वजह से यह केवल 8 ओवरों का कर दिया गया। पहले दो ओवर को पावर प्ले माना गया। इस मैच में रोहित शर्मा ने दुनिया के नम्बर एक गेंदबाज रहे जोश हेजलवुड के पहले ओवर में दो छक्के लगाये थे। एक छक्का केएल राहुल ने लगाया था। हेजलवुड के पहले ओवर में 20 रन बने थे। दूसरे ओवर में रोहित ने कमिंस पर एक छक्का लगाया। इस ओवर में 10 रन बने। यानी दो ओवर के पावर प्ले में भरत ने 30 रन बनाये। लेकिन इसी टीम को टी-20 विश्वकप में सांप क्यों सूंघ गया ? पहली गेंद से 'ठोको' रणनीति आखिर क्यों फुस्स हो गयी ? इस प्रतियोगिता के पहले तीन मैचों में भारत ने छह ओवर के पावर प्ले में 31, 32 और 33 रन बनाये। सात-आठ महीने से 'ठोको-ठोको' भजते रहे और जब समय आया तो सरेंडर कर दिया। पूरे विश्वकप में भारत का पहला विकेट कभी दूसरे, कभी तीसरे तो कभी चौथे ओवर में गिरता रहा। सलामी जोड़ी 30 रनों की भी साझेदारी के लिए तरस गयी। पावर प्ले में इतना लचर प्रदर्शन करने वाली टीम अगर सेमीफाइनल में हार गयी तो इसमें आश्चर्य कैसा।

रोहित-राहुल बस कागजी शेर

रोहित शर्मा और केएल राहुल पहले चाहे जितना गरजते-बरसते रहे हों लेकिन टी-20 विश्वकप में ये दोनों पानी का बुलबुला साबित हुए। इनकी नाकामी भारत के हार की सबसे बड़ी वजह रही। इस प्रतियोगिता में भारत ने कुल छह मैच खेले। पांच ग्रुप मुकाबले और एक सेमीफाइनल। पहले पांच मैचों में सलामी बल्लेबाजों के फ्लॉप शो पर नजर डालते हैं। पहले मैच में भारत कोहली और हार्दिक के कमाल से पाकिस्तान से जरूर जीत गया लेकिन रोहित और राहुल ने तो लुटिया डुबोने का पूरा प्रबंध कर दिया था। स्कोर अभी 7 रन था कि राहुल विकेट गंवा बैठे। 10 रन पर रोहित का दूसरा विकेट भी गिर गया। पावर प्ले में 31 रन ही बने और 3 विकेट भी चले गये। जिस टीम को 160 रनों के लक्ष्य का पीछा करना हो क्या उसके टॉप ऑर्डर की ऐसी बल्लेबाजी होनी चाहिए ? चलिए मान लिया कि पाकिस्तान के पास हारिस रऊफ, शाहीन आफरीदी और नसीम शाह जैसे ब़ॉलर थे। लेकिन नीदरलैंड की टीम में तो कोई ऐसा गेंदबाज नहीं था। इस टीम में तो किसी बॉलर की रफ्तार 150KM/H के आसपास भी नहीं थी। इसे तो टेस्टस्तर का भी दर्जा नहीं मिला है। फिर नीदरलैंड के खिलाफ भी पहले 6 ओवरों में भारत के सिर्फ 32 रन ही क्यों बने ? ऊपर से एक विकेट भी गंवाया। ये माफ करने लायक गलती नहीं है।

शुरुआती ओवरों की नाकामी, न विकेट बचा न तेज रन बने

तीसरे मैच में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ भारत ने पावर प्ले में 2 विकेट पर 33 रन, चौथे मैच में बांग्लादेश के खिलाफ 1 विकेट पर 37 रन और पांचवें मैच में जिम्बाब्वे के खिलाफ 1 विकेट पर 45 रन बनाये। यानी पहले छह ओवरों में भारत का अधिकतम स्कोर 45 रहा। जिम्बाब्वे के खिलाफ भी भारत का पहला विकेट 3.5 ओवर में गिर गया। रोहित शर्मा और केएल राहुल शुरू के ओवरों में अपना विकेट बचाते हुए दिखे। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ तो राहुल 14 गेंद खेल कर सिर्फ 9 रन बना सके। ये तो रणनीति के उलट खेल था। इसकी वजह से पहले छह ओवरों में न तो विकेट बचे और न ही तेज रन बन पाया। पाकिस्तान के खिलाफ पहले 50 रन बनाने के लिए 10.3 ओवर तक खेलना पड़ा। लगता था टीम इंडिया के बैटर टी-20 नहीं बल्कि टेस्ट मैच खेल रहे हों। नीदरलैंड जैसी टीम के खिलाफ भी भारत को पहले 50 रन बनाने के लिए 8.3 ओवरों तक जूझना पड़ा। जब कि द्विपक्षीय मुकाबलों में भारत पावर प्ले में ही 50 का स्कोर पार कर लेता था।

ये तो लगा ही नहीं कि भारत सेमीफाइनल खेल रहा है

भारत पांच में से चार मुकाबले जीत सेमीफाइनल में पहुंचा था। जब कि इंग्लैंड किस्मत के सहारे अंतिम चार में आया था। अगर ऑस्ट्रेलिया ने अफगानिस्तान को 106 रनों पर आउट कर दिया होता तो इंग्लैंड की इस प्रतियोगिता से विदाई हो गयी होती। लेकिन इंग्लैंड ने किस्मत से मिले इस मौके को दोनों हाथों से लपक लिया। वह भारत के खिलाफ जीत के लिए भूखा नजर आया। सेमीफाइनल में भारत का मनोबल ज्यादा ऊंचा होना चाहिए था क्यों कि उसके खाते में पहले से चार जीत दर्ज थी। लेकिन इस मैच में भारत के सलामी बल्लेबाज बिल्कुल दबे हुए नजर आये। इंग्लैंड के सबसे तेज गेंदबाज मार्क वुड इस मैच में नहीं खेल रहे थे। बेन स्टोक्स, क्रिस वोक्स, सैम करन और क्रिस जॉर्डन की गति मार्क वुड की तुलना में बहुत कम थी। फिर भी रोहित-राहुल इनके खिलाफ बच-बच कर खेलते रहे। ये तो करो या मरो का मैच था। इस मैच में तो रोहित शर्मा को कप्तानी पारी खेलनी चाहिए थी। जब कप्तान टीम को फ्रंट से लीड नहीं कर पाता है तो इसका बाकी खिलाड़ियों पर असर पड़ता है। रोहित हार का ठीकरा गेंदबाजों के सिर फोड़ रहे हैं। लेकिन उन्होंने क्या किया ? सेमीफाइनल में जब आप पहले बैटिंग कर रहे थे तब तो आपको मालूम था कि रनों की रफ्तार शुरू से ही तेज रखनी है। बोर्ड पर बड़ा स्कोर टंगने के लिए जरूरी था कि पावर प्ले में बड़े शॉट्स खेले जाएं। लेकिन रोहित-राहुल ने किया क्या ?

फेल हो रही सलामी जोड़ी को क्यों नहीं बदला ?

पहले 6 ओवरों में 38 रन ही बने और केएल राहुल चलते बने। रोहित के बल्ले से भी सिर्फ 27 रन निकले। इन दोनों की धीमी और लचर बल्लेबाजी से टीम दबाव में आ गयी। भारत के सौ रन 15 ओवर में बने। किसी भी लिहाज से यह सेमीफाइनल की बैटिंग नहीं थी। विराट कोहली को भी ओपनर के रूप में आजमाया गया था। टी-20 ओपनर के रूप में तो वे सेंचुरी मार चुके हैं। इस विश्वकप में उनका फॉर्म भी लाजवाब था। फिर क्यों नहीं कोहली को ओपनिंग में भेजा गया ? पहले प्रयोग करने का फायदा ही क्या जब मौके पर उसे लागू ही नहीं किया जाए? राहुल-रोहित की जोड़ी जब फेल हो रही थी तब सेमीफाइनल में कुछ नया होना चाहिए था। लेकिन द्रविड़ और रोहित कुछ नया सोचने की बजाय गलतियों को बार बार दोहराते रहे। भारत के खेल प्रेमी इन गलतियों को शायद ही कभी माफ करें।

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