IND VS AUS : भारतीय मूल के भी एक क्रिकेटर ने मारा है ऑस्ट्रेलिया के लिए टेस्ट शतक, जानिए कौन है वो?

पुणे में जन्मी लिसा स्थालेकर ने ऑस्ट्रेलिया की तरफ से खेलते हुए इंग्लैंड के खिलाफ महिला क्रिकेट टेस्ट में शतक लगाया था। उन्होंने उस्मान ख्वाजा की तरह पिच पर टिक कर खेला था।

lisa sthalekar

पाकिस्तानी मूल के ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज उस्मान ख्वाजा ने अहमदाबाद टेस्ट में शतक लगा कर अपनी धैयपूर्ण बल्लेबाजी की छाप छोड़ी। इसी तरह भारतीय मूल के भी एक क्रिकेटर ने ऑस्ट्रेलिया के लिए टेस्ट शतक लगाया है। फर्क बस इतना है कि यह क्रिकेटर पुरुष नहीं बल्कि महिला हैं। पुणे में जन्म लेने वाली लिसा स्थालेकर ने ऑस्ट्रेलिया की तरफ से खेलते हुए इंग्लैंड के खिलाफ महिला टेस्ट में शतक लगाया था। उन्होंने उस्मान ख्वाजा की तरह पिच पर टिक कर खेला था। करीब 6 घंटे की बल्लेबाजी में उन्होंने नाबाद 120 रन बनाये। लिसा स्थालेकर ने 120 रनों की पारी में केवल 4 चौके लगाये थे। इससे समझा जा सकता है कि उन्होंने कितनी धैर्यपूर्वक बल्लेबाजी की थी। ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच यह महिला टेस्ट मैच फरवरी 2003 में खेला गया था।

अभी WPL में खेल समीक्षक के रूप में सक्रिय

लिसा स्थालेकर इस वक्त भी चर्चा में हैं। वे अभी वीमेंस क्रिकेट लीग में खेल समीक्षक के रूप में दिखायी पड़ रही हैं। उनका नाम ऑस्ट्रेलिया की अनुभवी महिला क्रिकेटरों में शुमार है। भारतीय मूल की लिसा ने ऑस्ट्रेलिया की कप्तानी भी की है। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की तरफ से 8 टेस्ट, 125 वनडे और 54 टी-20 मैच खेले हैं। टेस्ट में एक शतक और वनडे में दो शतक लगाये हैं। वे ऑस्ट्रेलिया की चार विश्व कप विजेता टीम की सदस्य रहीं हैं। उनके नाम पर अनगिनत रिकॉर्ड हैं। उन्होंने अपना करियर एक स्पिन गेंदबाज के रूप में शुरू किया था लेकिन जल्द ही खुद को एक अच्छे बल्लेबाज के रूप में ढाल लिया। वे दुनिया की पहली महिला क्रिकेटर हैं जिन्होंने एक हजार रन और एक सौ विकेट लेने का रिकॉर्ड बनाया था।

विस्मयकारी कहानी की शुरुआत

लिसा स्थालेकर का जीवन किस्मत के खेल की निराली कहानी है। यह जितनी अद्भुत है उतनी ही प्रेरणादायी भी। दुर्भाग्य और सौभाग्य के बीच कितनी महीना रेखा है, यह लिसा की कहानी से समझा जा सकता है। मुम्बई के रहने वाले डॉ. हरेन स्थालेकर अमेरिका के मिशिगन में रहते थे। उन्होंने सू नाम की अंग्रेज महिला से शादी की थी। उन्हें कोई संतान नहीं थी। इसलिए स्थालेकर दम्पति ने भारत में आ कर लड़की को गोद लिया था। कुछ दिनों के बाद सू स्थालेकर के मन में आया कि अगर एक लड़का होता तो परिवार पूरा हो जाता। सू अंग्रेज थीं लेकिन डॉ. हरेन के साथ रह कर वे भी आम भारतीय की तरह सोचने लगीं थीं। पत्नी की बात पर डॉ. हरने भी लड़का गोद लेने के लिए राजी हो गये। डॉ. हरेन चूंकि मुम्बई के थे इसलिए उन्होंने पुणे के श्रीवत्स अनाथालय के बार में सुन रखा था जहां से बच्चे गोद लिये जाते थे।

किस्मत का लेखा

स्थालेकर दम्पति बच्चा गोद लेने के लिए अमेरिका से पुणे पहुंचा। उन्हें लड़का गोद लेना था। कई बच्चों को देखा लेकिन उनका दिल किसी को अपनाने के लिए राजी नहीं हुआ। उनकी छुट्टी खत्म हो रही थी। श्रीवत्स अनाथालय पुणे के ससून अस्पताल से जुड़ा हुआ है। यह पुणे का बहुत बड़ा और पुराना अस्पताल है जिसका निर्माण प्रसिद्ध यहूदी उद्यमी डेविड ससून ने कराया था। कभी- कभी परिस्थितियों की मारी मां बच्चों को अस्पताल में छोड़ कर गायब हो जाती थीं। इन बच्चों को लालन पालन के लिए अनाथालय में भेज दिया जाता था। कभी-कभी घनघोर गरीबी के कारण बच्चों को अनाथालय में सौंप दिया जाता था। डॉ. हरेन और सू स्थालेकर अमेरिका लौटने ही वाले थे कि उन्हें किसी ने एक नवजात बच्चे को देखने की सलाह दी।

दुर्भाग्य से सौभाग्य की ओर

बेटे की तलाश पूरी नहीं होने से डॉ. हरने और उनकी पत्नी बहुत निराश थे। उन्होंने सोचा अब तो अमेरिका लौटना ही है, जाने से पहले देख लेते हैं इस बच्चे को। अनाथालय में एक नवजात बच्चा पालने में पड़ा था। उसके जन्म के करीब आठ-दस दिन ही हुए थे। इस बच्चे की मां ने जन्म देने के बाद भगवान भरोसे छोड़ दिया था। स्थालेकर दम्पति बच्चे को देखने पहुंचे। सू स्थालेकर बच्चे की बड़ी भूरी आंखों को देख कर उसमें खो गयीं। यह नवजात शिशु एक बच्ची थी। लेकिन यह लड़की सू को इतनी भा गयी कि उन्होंने बेटा गोद लेने का ख्याल ही छोड़ दिया। डॉ. हरेन और सू ने इस बच्ची को गोद लेने का फैसला कर लिया। कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उन्होंने इस बच्ची को अपना लिया। जन्म के समय इस बच्ची को लैला के नाम से पुकारा जा रहा था। गोद लेने के बाद इसका नाम लिसा स्थालेकर रखा गया। जब डॉ. हरेन और सू लिसा को लेकर अमेरिका जाने लगे तब उसकी उम्र केवल 21 दिन थी। जन्म के बाद जिस बच्ची का भविष्य दुर्भाग्य के अंधेरे में घिर गया था अचानक उसका जीवन सौभाग्य के उजाले में पहुंच गया।

ऐसे बनी क्रिकेटर

अब इस परिवार में चार जन हो गये। डॉ. हरेन, उनकी पत्नी सू, बड़ी बेटी और लिसा। डॉ. हरेन को अपने काम के सिलसिले में अमेरिका से केन्या जाना पड़ा। कुछ दिनों तक स्तालेकर परिवार यहीं रहा। फिर डॉ. हरेन स्थालेकर ने ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में बसने का फैसला किया। सिडनी आने के बाद लिसा स्थालेकर का जीवन नये सांचे में ढलने लगा। डॉ. हरेन मुम्बई के थे। उस समय मुम्बई को क्रिकेट का गढ़ माना जाता था। डॉ. हरने कहते थे, क्रिकेट हर भारतीय के खून में दौड़ता है। खाली समय में वे अपने घर के पिछवाड़े में लिसा के साथ क्रिकेट खेलते थे। वे चाहते थे कि उनकी बेटी लिसा एक क्रिकेटर बने।

पुणे की लड़की बनी ऑस्ट्रेलिया की नामी क्रिकेटर

एक बार सिडनी में ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच महिला टेस्ट मैच का आयोजन हुआ। डॉ. हरेन अपनी बेटी को लेकर स्टेडियम पहुंचे। उसी समय लीसा ने पहली बार जाना कि लड़कियां भी टेस्ट मैच खेलती हैं। इसके बाद उसने क्रिकेट को गंभीरता से लिया। डॉ. हरेन अपनी बेटी के मार्गदर्शक बन गये। लिसा ने स्कूल की टीम से खेलना शुरू किया और कॉलेज पहुंचते-पहुंचते वह क्रिकेट की उभरती हुई खिलाड़ी बन गयी। ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद उसे 1997 में न्यू साउथ वेल्स की महिला क्रिकेट टीम में चुन लिया गया। फिर ऑस्ट्रेलिया की अंडर-23 टीम में जगह मिली। 2003 में लिसा स्थालेकर ने इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया था। 2013 में विश्वकप जीतने के बाद क्रिकेट से संन्यास ले लिया। 2012 में लिसा स्थालेकर जब भारत के दौरे पर आयी थी तब वह अपने जन्मस्थान को देखने पुणे के श्रीवत्स अनाथालय गयीं थीं। इंसान की जिंदगी में भाग्य की भूमिका कितनी प्रबल होती है, यह लिसा स्थालेकर की कहानी से समझा जा सकता है। जन्म देने वाली मां ने उन्हें ठुकरा दिया था लेकिन पालने वाली मां ने उन्हें एक चर्चित हस्ती बना दिया।

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