बजेगा हॉर्न निकलेगी तबला, बांसुरी, वायलिन की आवाज!
नई दिल्ली, 07 अक्टूबर। भारत के बड़े शहर हों या छोटे, बेवजह हॉर्न बजाना एक आम समस्या है. कई बार लोग ट्रैफिक लाइट पार करने के लिए लगातार हॉर्न बजाते रहते हैं. हॉर्न की भड़काऊ आवाज बुजुर्गों, बच्चों और मरीजों के लिए परेशानी का सबब बनती है. लेकिन जल्द ही देश में कानफोड़ हॉर्न की जगह वाहनों के हॉर्न के रूप में केवल भारतीय संगीत वाद्ययंत्रों की आवाज का इस्तेमाल हो सकता है.

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी एक ऐसा कानून बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं जिसके बाद गाड़ियों में संगीतमय हॉर्न लगाए जा सकेंगे. गडकरी का कहना है, "एक कलाकार ने आकाशवाणी (ऑल इंडियन रेडियो) की एक धुन बनाई थी और यह सुबह-सुबह बजाई जाती है. मैं एंबुलेंस के लिए उस धुन का उपयोग करने के बारे में सोच रहा हूं ताकि लोग सुखद महसूस करें."
वह आगे कहते हैं, "मंत्रियों के गुजरते समय तेज आवाज में हूटर बजता है. यह बहुत परेशान करने वाला है. इससे कानों को भी नुकसान होता है."
एंबुलेंस की आवाज भी बदलेगी
नासिक में एक राजमार्ग के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए गडकरी ने कहा कि वह एंबुलेंस और पुलिस की गाड़ियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सायरन का भी अध्ययन कर रहे हैं और उन्हें ऑल इंडिया रेडियो पर बजाए जाने वाले अधिक सुखद धुन के साथ बदलना चाहते हैं.
गडकरी ने कहा कि उन्होंने गाड़ियों पर लाल बत्ती के इस्तेमाल पर रोक लगाई और "अब इन सायरन को भी खत्म करना चाहता हूं."
कई अध्ययनों के मुताबिक भारत और अन्य जगहों पर शहरी इलाके में शोर में वाहनों की आवाज की बड़ी भूमिका होती है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कई शहरों में प्रमुख यातायात जंक्शनों पर डेसिबल लेवल पर नजर रखता है. चेन्नई, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और हैदराबाद जैसे शहरों को देश में सबसे अधिक शोर वाला पाया गया है.
खतरनाक है शोर
सरकारी आदेश है कि रिहायशी इलाकों में शोर का स्तर दिन के दौरान 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए. घड़ी की टिक-टिक की आवाज औसतन 20 डेसिबल होती है लेकिन 70 डेसिबल पर इंसान परेशान हो सकता है.
अमेरिका के सेंटर फॉर डिजिज कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन के मुताबिक लंबे समय तक 70 डेसिबल से ऊपर का शोर इंसान के सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचाना शुरू कर सकता है. 120 डेसिबल से ऊपर की तेज आवाज आपके कानों को तुरंत नुकसान पहुंचा सकती है. सीडीसी के मुताबिक शांत स्थान पर शून्य डेसिबल होता है और हल्की फुसफुसाहट 30 डेसिबल की ध्वनि होती है. उसके मुताबिक 60 डेसिबल तक कान को नुकसान नहीं होता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि ध्वनि प्रदूषण से बहरापन, दिल से जुड़ी समस्याएं, संज्ञानात्मक नुकसान, तनाव और अवसाद हो सकता है. लेकिन क्या सिर्फ हॉर्न की आवाज बदल देने से वाहन चालकों के व्यवहार में बदलाव आ जाएगा, इस लाख टके के सवाल का जवाब तभी मिल पाएगा जब वाकई में लोग ध्वनि प्रदूषण को लेकर जागरूक होंगे.
Source: DW
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