भाजपा नेतृत्व से आहत शांता कुमार ने राजनीति से की संन्यास की घोषणा, हिमाचल में एक युग का अंत
Shimla news, शिमला। हिमाचल की राजनिति में शांता कुमार का अलग स्थान रहा है। दलगत राजनिति से ऊपर उठकर उन्हें लोगों को अपनी राजनैतिक पारी के दौरान पूरा प्यार मिला है। यही वजह है कि शांता कुमार इस बार हालात को भांप ही नहीं पाये पार्टी अब उनसे छुटकारा पाने का पूरी तरह से मन बना चुकी है। पार्टी के इस फैसले से आहत शांता कुमार ने मंगलवार को राजनिति से संन्यास लेने की भी घोषणा कर दी। शांता कुमार ने धर्मशाला में एक कार्यक्रम में अपनी राजनीतिक पारी से सन्यास लेने की घोषणा कर भाजपा को भी सकते में डाल दिया। इस दौरान शान्ता कुमार के दिल का दर्द मंच से छलका और उन्होंने कहा, ''आज आप लोग विजय का उत्सव मनाएंगे और मैं विदाई का उत्सव मनाऊंगा।'' जाहिर है शांता कुमार को पार्टी का फैसला रास नहीं आया है।

मोदी से रहा है पुराना नाता
दरअसल, बदलते वक्त में शांता कुमार पर जातिगत समीकरण, बढ़ती उम्र इस कदर हावी हुये कि वह अपनी पसंद का कांगड़ा से लोकसभा प्रत्याशी भी नहीं तय कर पाये। पार्टी में अमित शाह व मोदी के बढ़ते प्रभाव का ही असर है कि शांता कुमार अपने साथ हुये इस बर्ताव पर चाहकर भी कुछ नहीं बोल पा रहे हैं। यह वही शांता कुमार जिन्होंने गुजरात दंगों के दौरान मोदी को राजधर्म की याद दिलाई थी व समय-समय पर पार्टी लाइन से अलग बयानबाजी कर पार्टी को दुविधा में डाला। मोदी व शांता कुमार के बीच उस समय भी रिशतों में खटास आई थी, जब मोदी पार्टी मामलों के हिमाचल प्रभारी थे। यह मोदी ही थे, जिनकी छत्रछाया में प्रदेश भाजपा में प्रेम कुमार धूमल उभर कर सामने आये व प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने।

बदल गए हालात
लेकिन आज हालात बदल गये हैं। शांता कुमार की छत्रछाया में राजनिति सीखने वाले भी उनसे दूर हो गये हैं। पालमपुर में यामिनी में उनसे मिलने आने वालों का भी वह मेला देखने को नहीं मिल रहा, जो पहले होता था। एक ओर 84 की उम्र में भाजपा ने शांता कुमार को रिटायर कर दिया है, तो दूसरी 90 पार कर चुके पंडित सुखराम को कांग्रेस अपना रही है। शांता कुमार पार्टी में हमेशा ही अपनी अलग राह चलते रहे हैं। हिमाचल की राजनिति में प्रेम कुमार धूमल की चुनौती भी उनके सामने रही, लेकिन हर समय शांता कुमार हर समय उन पर हावी रहे। कांगड़ा संसदीय चुनाव क्षेत्र में विधानसभा चुनावों के दौरान हर बार शांता कुमार के पंसद के लोगों को ही विधानसभा टिकट मिले और चुनाव जीतने पर उनकी सिफारिश पर मंत्रीपद भी मिले। इससे पार्टी में उनके कद का आकलन किया जा सकता है।

शांता कुमार की विदाई से हिमाचल के लोग हैरान
शांता कुमार की इस कदर हुई विदाई से हिमाचल के लोग हैरान हैं। उन्होंने पिछला चुनाव एक लाख से अधिक मतों से जीता था, जिससे लग रहा था कि शायद पार्टी उन्हें इस बार चुनाव में उतार कर उन्हें सम्माजनक विदाई दे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शांता कुमार ने खुद माना है कि उम्र के फार्मूले की वजह से ही उनका टिकट काटा गया है। उन्होंने कहा, ''मैं तो पहले भी चुनाव लड़ने का इच्छुक नहीं था। मैंने पार्टी को यह बात पहले बता दी थी।'' हालांकि, शांता कुमार भले ही अब कुछ कहें, लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने बीते सप्ताह खुद ही सार्वजनिक तौर पर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी। शायद उस समय उन्हें उनके साथ होने वाली घटना का आभाष नहीं रहा होगा।

बीजेपी ने किशन कपूर को मैदान में उतारा
शांता कुमार का जब टिकट कटा तो उस समय वह चाह रहे थे कि कांगड़ा से पार्टी उनकी पसंद के राजीव भारद्धाज को टिकट दे, लेकिन इसे नहीं माना गया। एक समय शांता कुमार के ही चहेते रहे किशन कपूर को पार्टी ने मैदान में उतार कर हर किसी को हैरान कर दिया। इसके पीछे जातिगत समीकरण भी देखे गये। शांता कुमार ब्राम्हण हैं। कपूर गद्दी समुदाय से आते हैं, जिनका मजाक शांता कुमार ने बीते सप्ताह ही टिकट को लेकर उड़ाया था। बताया जा रहा है कि उसके बाद ही शांता कुमार को पार्टी में टिकट न देने का महौल तैयार हुआ। कपूर प्रदेश सरकार में मंत्री हैं व कांगड़ा व चंबा जिलों में उनका जनाधार है। कांगड़ा संसदीय चुनाव क्षेत्र में दस एसेंबली हल्कों में गद्दी समुदाय के मतदाता हैं। व गद्दी समुदाय अरसे से भाजपा का वोट बैंक रहा है। यह पहला मौका है, जब किसी राजनैतिक दल ने इस समुदाय को टिकट दिया है।

दो बार हिमाचल के सीएम रह चुके हैं शांता कुमार
12 सितंबर 1934 जन्मे शांता कुमार दो बार हिमाचल के सीएम रहे हैं। उन्होंने प्रांरभिक शिक्षा के बाद जेबीटी की पढ़ाई की और एक स्कूल में टीचर लग गए। लेकिन आरएएस में मन लगने की वजह से दिल्ली चले गए। वहां जाकर संघ का काम किया और ओपन यूनिवसर्सिटी से वकालत की डिग्री की। पंच के चुनाव से राजनीति की शुरुआत की। शांता कुमार ने 1963 में पहली बार गढज़मूला पंचायत से जीते थे। उसके बाद वह पंचायत समिति के भवारनां से सदस्य नियुक्त किए गए. बाद में 1965 से 1970 तक कांगड़ा जिला परिषद के भी अध्यक्ष रहे। सत्याग्रह और जनसंघ के आंदोलन में भी शांता कुमार ने भाग लिया और जेल की हवा भी खाई। 1971 में शांता कुमार ने पालमपुर विधानसभा से पहला चुनाव लड़ा और कुंज बिहारी से करीबी अंर्त से हार गए। एक साल बाद प्रदेश को पूर्णराज्य का दर्जा मिल गया और 1972 में फिर चुनाव हुए शांता कुमार खेरा से विधानसभा पहुंचे।

दो बार नहीं पूरा कर सके कार्यकाल
साल 1977 में आपातकाल के बाद जब विधानसभा चुनाव हुए तो जनसंघ की सरकार बनी और शांता कुमार ने कांगडा के सुलह विधानसभा से चुनाव लड़ा और फिर प्रदेश के मुखिया बने, लेकिन सरकार का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। इसके बाद 1979 में पहली बार कांगड़ा लोकसभा के चुनाव जीते और सांसद बने। साल 1990 में वह फिर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, लेकिन 1992 में बाबरी मस्जिद घटना के बाद शांता कुमार एक बार फिर अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में शांता कुमार खाद्य वह उपभोक्ता मामले के मंत्री बने। साल 1999 से 2002 तक वाजपेयी सरकार में ग्रामीण विकास मंत्रालय का मंत्री भी शांता कुमार को बनाया गया। मौजूदा समय में भी कांगड़ा लोकसभा सीट के सांसद हैं। 2008 में उन्हें राज्यसभा के लिए भी चुना गया था। शांता कुमार ने आपातकाल के दौरान जेल में किताबें भी लिखी हैं। वह एक नेता होने के साथ वह एक अच्छे लेखक भी हैं।












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