Chaitra Navratri 2023: मां सती के हार से बना शक्तिपीठों में से एक 'शारदा देवी मंदिर', जानें इसका रहस्य
Maihar Devi Temple: मैहर की माँ शारदा की नगरी में हर वर्ष शारदेय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि पर मेला लगता है, जहाँ दूर दूर से देवी भक्त अपनी अपनी मुरादें लेकर पहुंचते हैं।

Chaitra Navratri 2023: सतना जिले के मैहर में मां शारदा देवी मंदिर (Sharda Devi Temple) 52 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां मां जगदंबा सती के गले का हार गिरा था। मां शारदा को माई भी कहा जाता है। इसलिए इस नगरी को माई का हार गिरने के वजह से 'मैहर' और 'माई हार' कहा जाने लगा। इन नामों में परिवर्तन के वजह से इस नगर का नाम 'मैहर' हो गया। इतना ही नहीं मां सती के गले से हार गिरने के कारण ही उन्हें विद्या की देवी मां शारदा के नाम से जाना जाने लगा।
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मां शारदा के पुजारी पंडित नितिन पांडेय ने 'वनइंडिया हिंदी' को जानकारी देते हुए बताया कि पुराणों के अनुसार उनकी पुत्री ने राजा दक्ष के परमिशन के विरुद्ध भगवान शंकर से विवाह कर ली थी। राजा दक्ष ने यज्ञ कराया था लेकिन दामाद भगवान शिव और पुत्री सती को निमंत्रण नहीं था। इससे गुस्सा होकर सती ने हवन कुंड में छलांग लगा दी। भगवान शंकर अपने शरीर से तांडव करने लगे। इस पर भगवान विष्णु ने माता सती के शरीर पर सुदर्शन चक्र चला दिया। इससे माता सती के शरीर के 52 टुकड़े हो गए। मां सती के जहां-जहां अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ कहलाने लगा। इनमें से माता का हार मैहर के त्रिकूट पर्वत में गिरा था। इसलिए हार के कारण मैहर व कंठ के कारण सरस्वती रूपा माता शारदा कहलाए। पुजारी नितिन पांडेय ने बताया कि यहां हमेशा ही दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहती है। शारदीय और चैत्र नवरात्रि में मां शारदा के दरबार में माथा टेकने का खास महत्व है।

माई ने पहली बार ग्वाले को दिए थे दर्शन
एक यह भी मान्यता प्रचलित है कि मां शारदा ने पहली बार एक ग्वाले को दर्शन दिए थे। करीब 200-250 साल पहले की बात है, चरवाहे ने तत्कालीन राजा दुर्जन सिंह जूदेव को आप बीती कहानी सुनाई थी। कहा जाता है कि राजा दुर्जन सिंह ने मां शारदा की मूर्ति स्थापना कर पूजा-अर्चना की और भंडारा किया।
मान्यता के अनुसार दामोदर नाम का एक ग्वाला था। वह प्रतिदिन त्रिकुटा पर्वत गोवंश चराने जाता था। कुछ दिनों बाद एक सुंदर गाय दिखी और उसके गोवंश के झुंड में शामिल हो गई। कहा जाता है कि एक दिन वह सुंदर गाय पहाड़ की चोटी पर चली गई। चरवाहा भी उसके पीछे-पीछे पहाड़ पर चढ़ जाता है। वह गाय एक चट्टान में घुस जाती है। वहां से एक बूढ़ी मां निकलती है। मां उसे हीरे जेवरात देकर गायब हो जाती है। इसके बाद चरवाहे ने तत्कालीन राजा को यह आपबीती बताई।

पुजारी से पहले मां शारदा की हो जाती है पूजा
यहां की मान्यता है कि महोबा के वीर आल्हा और उदल सबसे पहले त्रिकुटा पर्वत की चोटी पर विराजमान माता शारदा की पूजा अर्चना करने आते हैं। पूर्व प्रधान पुजारी स्वर्गीय देवी प्रसाद पांडेय भी ने कई बार दावा किया था कि सुबह पट खुलने से पहले मां के चरणों में फूल नजर आते हैं। हालांकि मौजूद पुजारी ने कहा ऐसा कई बार दिखा कि रात में कुछ हुआ है। जनश्रुतियां के मुताबिक 12 वीं सदी में महोबा के आल्हा और ऊदल माता शारदा के परम भक्त हुआ करते थे। आल्हा ने 12 वर्ष तक तपस्या की थी। इस दौरान अपना सिर भी मां के चरणों में चढ़ाया था। इस भक्ति से प्रसन्न होकर मां ने आल्हा को अमरता का वरदान दिया था।
मां शारदा धाम कैसे पहुंचे
मैहर के नजदीक खजुराहो हवाई अड्डा है जो मंदिर से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर है। इसके अलावा, मैहर जबलपुर-सतना रेल मार्ग से जुड़ा हुआ है, जिसमें मैहर रेलवे स्टेशन भी है, और यहाँ से शारदा माता मंदिर की दूरी लगभग 5 किलोमीटर है। हालाँकि, सतना को मैहर तक पहुँचने के लिए मुख्य रेलवे स्टेशन माना जाता है। क्योंकि लगभग सभी ट्रेनें सतना रेलवे स्टेशन पर रूकती है। सतना रेलवे स्टेशन से मैहर मंदिर की दूरी 44 किलोमीटर है। मैहर सड़क मार्ग से जबलपुर, सतना ,खजुराहो और प्रयागराज से भी जुड़ा हुआ है।












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