राजस्थान में इस बार क्यों हो रही वन्यजीव गणना, पिछले साल आखिर क्या हुआ जो नहीं हो गया यह काम ?
Rajasthan News: प्रदेश में आज सुबह 8 बजे शुरू हुई वन्यजीव गणना अगले 24 घंटे तक मचान पर बैठकर वाटर होल पद्धति से की जा रही है। पिछले साल बे मौसम बारिश के चलते वाटर होल पद्धति से वन्य जीव गणना नहीं हो पाई थी।
ऐसे में इस बार हो रही वन्यजीवों की गणना महत्वपूर्ण हैं। वाटर होल पद्धति से वन्य जीव गणना से ही वन्यजीवों की संख्या के वास्तविक आंकड़े मिल पाएंगे।

राजस्थान के जंगलों में आज सुबह 8 बजे से वन्यजीव गणना शुरू हो गई है। जो शुक्रवार सुबह 8 बजे तक जारी रहने वाली है। इन 24 घंटों के दौरान वनकर्मी, वन्यजीव प्रेमी साथ मिलकर वाटर होल पद्धति से बाघ-बघेरे, भालू, भेड़िया, जरख, चिंकारा, चीतल, काले हिरण, विभिन्न प्रजातियों के पक्षी आदि दूसरे वन्यजीवों की संख्या का आकलन करेंगे।
कोटा में वन्यजीव मंडल ने 2 दिन पहले ही वनकर्मियों वन्यजीव प्रेमियों को गणना का प्रशिक्षण करवाया। इसके बाद आज सुबह 8 बजे से पूरे प्रदेश में मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक पीके उपाध्याय की मॉनिटरिंग में वन्यजीव गणना चल रही है।
जहां बाघ-बघेरे व दूसरे वन्यजीवों की संख्या का आकलन किया जा रहा है। कोटा के अभेड़ा तालाब, उम्मेदगंज, भैंसरोड गढ़, शेरगढ़ सेंचुरी में वाटर पॉइंट पर मचान बनाए गए हैं। मचान पर बैठकर वन्यजीवो को गिना जाएगा। रात होने पर पूर्णिमा की धवल चांदनी रात की रोशनी में वन्यजीव गिने जाएंगे।
पिछले साल बे मौसम बारिश के चलते वाटर होल पद्धति से वन्य जीव गणना नहीं हो पाई थी। ऐसे में इस बार वन्यजीवों की गणना महत्वपूर्ण हैं। वाटर होल पद्धति से वन्य जीव गणना से ही वन्यजीवों की संख्या के वास्तविक आंकड़े मिल पाएंगे।
वनकर्मी बुधराम जाट, मनोज शर्मा ने बताया वन्यजीव गणना के लिए एक वाटर प्वाइंट पर दो लोग है, खाने पीने की व्यवस्था की गई है। जैसे जैसे वन्यजीव पानी पीने आ रहे है मचान पर बैठे गणक इनकी गिनती कर रहे है।
वाटर होल पद्धति से कैसे होती है गणना?
वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि वाटर होल पद्धति के तहत जब गणना की जाती है तो जंगल के किसी भी वाटर पॉइंट पर ऊंचाई पर मचान बनाकर गणना करने वाले कर्मी को नोट सीट देकर तैनात किया जाता है। तालाब पोखर पर आने वाले वन्य जीव की प्रजाति, संख्या नर एवं मादा की पहचान नोट शीट में दर्ज की जाती है।
24 घंटे में कितने वन्य जीव वाटर पॉइंट पर पहुंचे। इसकी पूरी मॉनिटरिंग की जाती है। वहीं आसपास नजर आने वाले बर्डस की भी काउंटिंग एवं प्रजाति के बारे में नोट शीट में रिकॉर्ड मेंटेन किया जाता है।
वाटर होल पद्धति के तहत जो भी वन्य जीव विभिन्न प्रजातियों के बुद्ध पूर्णिमा पर ही गणना की जाती है, क्योंकि रात में भी विजिबिलिटी बेहतर रहती है। तालाब पर आने वाले वन्य जीव चांद की रोशनी में साफ नजर आते हैं।
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