17th Jaipur Literature Festival 2024: देश की जीडीपी में जैन समाज के योगदान पर देवदत्त पटनायक क्या बोल गए?
17th Jaipur Literature Festival 2024: 17 वां जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2024 में आज प्रसिद्ध लेखक देवदत्त पटनायक का सत्र हुआ।
पिंकसिटी जयपुर के होटल क्लार्क्स आमेर में चल रहे 17 वें लिटरेचर फेस्टिवल का आज तीसरा दिन था। जहां आज तीर्थंकर इनसाइट्स इंटू जैनिज़्म विषय पर सत्यार्थ नायक ने उनके साथ बात की ।

जिसमें आज प्रसिद्ध लेखक देवदत्त पटनायक ने जैन समाज और तीर्थंकरों को लेकर कई बातें की। लेखक देवदत्त ने कहा कि उन्होंने कहा कि बाहुबली जैसी मूवी में हिंसा थी, लेकिन उससे हमारी संस्कृति जानने का मौका मिला।
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— PURSHOTTAM KUMAR (@pkjoshinews) February 3, 2024
तीर्थंकर शांति की बात करते हैं, वो सबके लिए काम करते हैं सिर्फ खुद के लिए काम नहीं करते है। जैन और बौद्ध धर्म में कोई पावर फुल भगवान नहीं हैं। जबकि हिन्दु धर्म में भगवान शक्तिशाली दर्शाये गए हैं।
पटनायक ने देश की जीडीपी में जैन समाज का बड़ा और अहम योगदान बताया है । दावा किया है कि जैन समाज संख्या और जनसंख्या के प्रतिशत में भले ही देश में सबसे कम हो लेकिन इसका देश की जीडीपी में अहम योगदान है।
लेखक देवदत्त ने कहा कि कन्वर्ट शब्द विदेशी है और विदेशी लोगों ने ही यहाँ के लोगों को कन्वर्ट किया है। संस्कृति का नुकसान किया है।
इसके बाद लेखक देवदत्त पटनायक मीडिया से भी मुखातिब हुए जहां उन्होंने अपनी पुस्तक "तीर्थंकर" को लेकर जानकारी दी।
देवदत्त पटनायक ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि मैथोलोजी केवल विचार है। जबकि इतिहास भूतकाल की घटनाएँ बताता है।
शास्त्र आपको उत्तेजित नहीं करते शांत करते है जबकि सीरियल आपको उत्तेजित करते है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा की हमे दक्षिण पंत और वामपंथ दोनों चाहिए।
देवदत्त ने एक कहावत का उदाहरण देते हुए कहा कि "जगत मिथ्या और ब्रह्म सत्य" यानी हम सब लोग मिथ्या में अटके हुए है। सच किसी को नहीं पता है। ब्रह्म ही सत्य है। अगर कोई परम सत्य जानता है और वह बोलता है कि में सच बोल रहा हूं तो वहीं व्यक्ति झूठ बोल रहा है।
वन इंडिया के संवाददाता के सवालों के जवाब में कहा कि जिसके हाथ में तलवार है वहीं व्यक्ति सच बोलता है। क्योंकि किसी को सच बोलके अपनी गर्दन तो कटवानी नहीं है। मैं खुद भी झूठ ही बोलता हूं क्योंकि मेरे पास तो सिर्फ कलम है।
सन्यासियों और संतों के ज्ञान को लेकर भी देवदत्त ने बड़ी बेबाकी से कहा कि सन्यासी सिर्फ सन्यास का ज्ञान दे सकता है। काम शास्त्र का या फिर गृहस्थ आश्रम का ज्ञान तो वह दे ही नहीं पाएगा।
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