सीकर प्रदर्शन केस में बड़ा फैसला: सांसद अमराराम समेत 20 लोग आरोपमुक्त, कोर्ट ने माना-आरोप साबित नहीं
राजस्थान की छात्र राजनीति और सियासी आंदोलनों में अहम माने जाने वाले 2019 के सीकर धरना-प्रदर्शन प्रकरण में अदालत ने आज दो अगस्त 2025 को एक अहम निर्णय सुनाया है। सीकर की अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या-1 ने मौजूदा सीकर सांसद अमराराम, पूर्व विधायक बलवान पूनिया समेत 20 आरोपियों को सभी धाराओं से बरी कर दिया है। सीकर न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को प्रमाणित करने में विफल रहा।
यह मामला उस समय चर्चा में आया था जब सीकर में छात्रसंघ चुनाव 2019 में कथित गड़बड़ियों के विरोध में संगठनों ने सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किया था और प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए थे। 28 अगस्त 2019 को सीकर के कल्याण बालिका महाविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव के दौरान मतगणना के समय हालात तनावपूर्ण हो गए थे।

तब स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की छात्राओं ने कॉलेज प्राचार्य के निलंबन की मांग को लेकर कलेक्ट्रेट के सामने धरना दिया, जो बाद में सड़क जाम में तब्दील हो गया। पुलिस ने स्थिति नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया और लाठीचार्ज किया गया। इसके विरोध में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और उससे जुड़े संगठनों ने 16 सितंबर 2019 को एक रैली निकालते हुए दोबारा सड़क जाम किया। करीब 1000 लोगों की भीड़ थी, जिसमें नेताओं के साथ छात्र, युवा और किसान संगठनों के कार्यकर्ता शामिल थे।
प्रशासन की एफआईआर और नामजद आरोप
सीकर पुलिस ने 17 सितंबर 2019 को इस घटना को लेकर एफआईआर दर्ज की। तत्कालीन सीकर कोतवाली थानाधिकारी श्रीचंद की शिकायत पर सांसद अमराराम, उनके भाई पेमाराम, पूर्व विधायक बलवान पूनिया, हरफूल बाजिया, रूडसिंह महला, सत्यजीत भींचर, सुभाष नेहरा, कय्यूम कुरैशी, विजेंद्र ढाका सहित 20 लोगों को नामजद किया गया। आरोपों में सड़क जाम, सरकारी कार्य में बाधा, और भड़काऊ भाषण जैसी धाराएं शामिल थीं।
अदालत का फैसला: सबूतों का अभाव, सभी आरोपी बरी
करीब छह वर्षों तक चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर पाया। वीडियो फुटेज, चश्मदीदों की गवाही और केस डायरी में आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी। कोर्ट ने सभी 20 आरोपियों को आरोपमुक्त कर दिया।
सांसद अमराराम की प्रतिक्रिया
निर्णय के बाद सीकर सांसद अमराराम ने इसे "जन आंदोलन की न्यायिक जीत" करार देते हुए कहा कि प्रशासन ने सरकार के इशारे पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को झूठे मुकदमों में फंसाया था। उन्होंने कहा, "हम लोकतंत्र की रक्षा के लिए खड़े हुए थे, और आज अदालत ने साबित किया है कि हमारा विरोध जायज था।"












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