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Rajasthan News: मदन राठौड़ के मंच पर सहज भाव में क्यों नजर आई वसुंधरा राजे, क्या है पद, मद और कद का पूरा खेल

Rajasthan News: राजस्थान में पिछले दिनों भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के पदभार ग्रहण में भाजपा परिवार की तरह एकजुट नजर आई। ऐसा लंबे समय बाद हुआ जब भाजपा के तमाम नेता किसी पार्टी अध्यक्ष के कार्यक्रम में एक जाजम पर नजर आए। इस समारोह में राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी शामिल हुई।राजनीति के जानकार बताते हैं कि सतीश पूनिया और सीपी जोशी ताजपोशी में वसुंधरा राजे शामिल नहीं हुई थी। लेकिन लंबे अरसे के बाद मदन राठौड़ के पदभार ग्रहण कार्यक्रम में वसुंधरा राजे शामिल हुई।

वसुंधरा राजे जब मंच पर पहुंची तो पंडाल वसुंधरा समर्थक नेताओं से भरा था। आगे की पंक्ति में राजे की पूरी टीम नजर आ रही थी। इसके बाद जब वसुंधरा राजे ने कार्यक्रम को संबोधित किया तो पूरा प्रदेश हैरान रह गया। मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा वसुंधरा राजे की बात सुनते रहे। राजे ने पद, मद और कद को लेकर दमदार भाषण दिया। इस कार्यक्रम में एक बार फिर जय-जय राजस्थान का नारा गूंजा। पूर्व सीएम वसुंधरा राजे ने अपने संबोधन के दौरान किसे निशाने पर लिया। इसे लेकर अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं। लेकिन अहम बात यह है कि उपचुनाव से ठीक पहले मदन राठौड़ के पदभार के बहाने एक जाजम पर तो आ गई। लेकिन क्या यह एकजुटता विधानसभा उपचुनाव तक बनी रह पाएगी। सियासी गलियारों में इसी बात को लेकर चर्चा की जा रही है।

vasundhara raje

क्या है वसुंधरा राजे की रणनीति

राजस्थान भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के पदभार समारोह के दौरान वसुंधरा राजे ने एक कुशल राजनेता का परिचय दिया। वसुंधरा राजे की गिनती राजस्थान के बड़े नेताओं में की जाती है। राज्य में वे एकमात्र ऐसी नेता हैं। जो जनता के बीच अब भी अपना प्रभाव रखती है। पदभार ग्रहण समारोह के दौरान वसुंधरा राजे बिल्कुल सहज भाव में नजर आई। उन्होंने कहा कि उतार-चढ़ाव राजनीति का हिस्सा है। इससे साफ हो रहा था कि वसुंधरा राजे ने अपने राजनीतिक कैरियर के उतार को स्वीकार किया है। लेकिन इसी के साथ ही उन्होंने अपनी राजनीतिक कुशलता का भी परिचय दिया। वसुंधरा राजे ने साफ कर दिया कि पार्टी और राजस्थान छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली है। वसुंधरा राजे पार्टी के भीतर रहकर ही हालत बदलेंगी। उन्होंने सहज भाव में आकर सभा को संबोधित किया। इसे लेकर प्रदेश में चर्चा हो रही है। आपको बता दे कि पिछले दिनों वसुंधरा राजे झालावाड़ के दौरे पर थी। इस दौरान उन्होंने लाव-लश्कर छोड़कर स्कूटी पर जिले के दो शहरों में जायजा लिया। इसकी भी खूब चर्चा हुई। वसुंधरा राजे के महारानी वाले अंदाज को छोड़कर इस सहज भाव को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं कि वसुंधरा राजे किसी बड़ी रणनीति पर काम कर रही है।

पार्टी के भीतर भारी गुटबाजी

राजस्थान में भाजपा के भीतर विधानसभा चुनाव से पहले ही भारी गुटबाजी चल रही है। पार्टी हाई कमान भी इस गुट-बाजी को रोकने में असफल रहा है। चुनाव के बाद भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद तो पार्टी का हर कार्यकर्ता महत्वाकांक्षी हो गया है। राजनीति के जानकार बताते हैं कि अब कार्यकर्ताओं का मानना है कि भजनलाल शर्मा जैसे जमीनी कार्यकर्ता भी अगर मुख्यमंत्री बन सकते हैं तो हम क्यों नहीं बन सकते हैं। ऐसे में पार्टी में बड़े पैमाने पर बिखराव की स्थिति पैदा हो गई है। पिछले दिनों किरोड़ी लाल मीणा के इस्तीफे ने इस बिखराव के साथ संकेत दिए थे। अब यही बिखराव पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए भी मुसीबत का सबब बन गया है। प्रदेश में कुछ ही दिनों में पांच विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं। ऐसे में पार्टी के सामने सभी को एकजुट कर चुनाव मैदान में उतारना बड़ी चुनौती है।

मदन राठौड़ के सामने बड़ी चुनौतियां

राजस्थान भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनने के साथ ही मदन राठौड़ को कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। प्रदेश में सिर पर विधानसभा उपचुनाव हैं। इसके साथ ही पार्टी में गुटबाजी को खत्म करना उनकी प्राथमिकता होगी। हालांकि पदभार समारोह में मदन राठौड़ अपनी व्यवहार कुशलता के चलते सभी नेताओं को एक जाजम लाने में काफी हद तक सफल रहे हैं। लेकिन क्या विधानसभा उपचुनाव तक वे इस एकजुटता को बरकरार रख पाएंगे। यह नवनियुक्त प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के सामने बड़ी चुनौती होगी।

पार्टी में जमीनी कार्यकर्ताओं में आक्रोश

राजनीतिक जानकारों की माने तो पार्टी के भीतर जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में आक्रोश है। भाजपा सत्ता में तो आ गई। लेकिन कार्यकर्ताओं को यह एहसास नहीं हो रहा है कि वे सत्ता में है। पार्टी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सरकार में उनके कामकाज नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में उन्हें यह महसूस ही नहीं हो रहा है कि उनकी पार्टी सत्ता में है। प्रदेश में अगले कुछ ही समय बाद निकाय और पंचायत राज के चुनाव होने है। ऐसे में पार्टी की जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं में निराशा है। पार्टी कार्यकर्ताओं में अगर यही निराशा बरकरार रही तो विधानसभा उपचुनाव और पंचायत राज चुनाव के नतीजों पर असर पड़ेगा।

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