राजस्थान चुनाव में यह 'नई पार्टी' न बदल दे माहौल, कांग्रेस-बीजेपी दोनों की बढ़ सकती है चुनौती
राजस्थान विधानसभा चुनाव के परिणामों का ट्रेंड बदलने के लिए कांग्रेस पार्टी पूरे दमखम से जुटी हुई है। वहीं, बीजेपी को लगता है कि अशोक गहलोत सरकार की पांच साल की एंटी इंकंबेंसी और हर बार सरकार बदलने का राज्य का पुराना ट्रेंड उसके लिए सत्ता में वापसी की गारंटी बन सकता है।
लेकिन, इन दोनों राष्ट्रीय दलों को एक नई पार्टी की वजह से कांटे की टक्कर के बीच अलग तरह चुनौती बढ़ सकती है। यह नया दल है 'भारतीय आदिवासी पार्टी', जो 'भारतीय ट्राइबल पार्टी' के टूटने से बनी है।

राजस्थान के आदिवासी बेल्ट में बढ़ी चुनौती
राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में इस दल का समर्थन है और यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी में आदिवासी क्षेत्रों का कई दौरा कर चुके हैं और आगे भी करने वाले हैं। सोमवार को पीएम मोदी चित्तौड़गढ़ जिले की यात्रा करने जा रहे हैं, जहां वो एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे। इस क्षेत्र में आदिवासियों की अच्छी-खासी आबादी है।
राजस्थान में आदिवासी वोटरों का प्रभाव
राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के उपनेता सतीश पूनिया जब प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष थे, तब भी वह इस क्षेत्र में आते रहते थे। अभी सीपी जोशी के पास प्रदेश भाजपा की कमान है, जो चित्तौड़गढ़ से ही पार्टी सांसद भी हैं। राजस्थान में बांसवाड़ा, डुंगुरपुर और प्रतापगढ़ पूरी तरह से आदिवासी जिले हैं। जबकि, उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, सिरोही, पाली में भी ये बहुतायत में हैं।
युवाओं के हाथ में भारतीय आदिवासी पार्टी की कमान
भारतीय आदिवासी पार्टी की खासियत यह है कि इसकी कमान भी गुजरात आधारित भारतीय ट्राइबल पार्टी की तरह ही युवा नेताओं के हाथों में है। 2018 में भारतीय ट्राइबल पार्टी ने राजस्थान में दो सीटें जीती थी। भारतीय ट्राइबल पार्टी मूल रूप से गुजरात की पार्टी है,लेकिन पिछले चुनाव में इसने राजस्थान में कमाल किया था।
आदिवासियों के बीच बढ़ रहा है समर्थन
नई पार्टी मौजूदा विधायक राजकुमार रोत और विधायक रामप्रसाद डिंडोर ने इसी महीने बनाई है, जो कि पिछली बार भारतीय ट्राइबल पार्टी से चुनाव जीते थे। भारतीय ट्राइबल पार्टी के ज्यादातर समर्थक और नेता अब नई हवा में ही बहने लगे हैं। भारतीय आदिवासी पार्टी की सभाओं में जो आदिवासियों की भीड़ उमड़ रही है, वहां कांग्रेस और बीजेपी के लिए चुनौती बनती जा रही है।
बीजेपी-कांग्रेस दोनों के खिलाफ चुनाव लड़ेगी
स्थानीय भाजपा नेताओं का भी मानना है कि भारतीय आदिवासी पार्टी आदिवासी क्षेत्रों में अपना दबदबा बढ़ाने लगी है। राजकुमार रोत ने न्यूज एजेंसी पीटीई से कहा है 'हमने आदिवासी समाज के लिए काम करने के वास्ते नया संगठन बनाया है। क्षेत्र की 18 सीटों पर हम भारतीय आदिवासी पार्टी के उम्मीदवार उतारेंगे।' उनके मुताबिक 'हम बीजेपी और कांग्रेस दोनों को हराने की कोशिश करेंगे। '
बीजेपी नेता भी मान रहे हैं नई पार्टी के प्रभाव की बात
बीजेपी के स्थानीय नेता और पूर्व मंत्री सुशील कटारा भी मानते हैं कि भारतीय आदिवासी पार्टी के पक्ष में आदिवासियों का समर्थन किस तरह से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, 'क्षेत्र में कांग्रेस का अस्तित्व खत्म होने के कगार पर है। इस क्षेत्र (आदिवासी क्षेत्र) में विधानसभा चुनाव में भारतीय आदिवासी पार्टी आगे चल रही है, जबकि कांग्रेस तीसरे स्थान पर रहेगी।' 2018 में राजकुमार रोत से हारने वाले नेता ने कहा, 'वे शिक्षित हैं, सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और अपने पक्ष में आदिवासी लोगों को एकजुट कर रहे हैं।'
कांग्रेस को आदिवासी क्षेत्र में भी बढ़त का भरोसा
हालांकि, बांसवाड़ा जिले के एक कांग्रेस नेता का दावा है कि गहलोत सरकार ने आदिवासी इलाकों के विकास के लिए काफी काम किया है, इसलिए चुनावों में इस क्षेत्र में पार्टी आगे रहेगी। उधर भारतीय ट्राइबल पार्टी का कहना है कि भारतीय आदिवासी पार्टी बना लेने से कुछ भी नहीं होगा, वह फिर भी 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी।
पार्टी का यह भी कहना है कि कांग्रेस और बीजेपी के नेताओं के ताबड़तोड़ दौरों का भी कोई असर नहीं होने वाला। इस पार्टी के राजस्थान इकाई के चीफ वेलाराम घोघरा ने दावा किया कि 'चाहे वे कितना भी दम लगा लें, आदिवासी उन्हें वोट नहीं देंगे।' लगता है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों की नजरें भारतीय ट्राइबल पार्टी के प्रदर्शन पर ही टिकेंगी, क्योंकि भारतीय आदिवासी पार्टी के प्रभाव के विस्तार में इसी के माध्यम से ही सिर्फ लगाम लगने की उम्मीद दिख रही है।












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