Harish Dhandev : सरकारी नौकरी छोड़कर 900 बीघा में खेती करने लगा इंजी. हरीश, कमाई ढाई करोड़ रुपए
जैसलमेर। एक बार सरकारी नौकरी लगने के बाद लोग उसी में पूरी जिंदगी खपा देते हैं। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो सरकारी नौकरी छोड़ने का जोखिम लेते हैं और कामयाबी की नई कहानी लिख देते हैं। ऐसे में शख्स हैं हरीश धनदेव।

जैसलमेर के प्रगतिशील किसान बने हरीश धनदेव
सात साल पहले ये एक बेहतरीन सरकारी इंजीनियर हुआ करते थे, मगर अब इनका नाम राजस्थान के प्रगतिशील किसानों की सूची में शुमार है। यह सब हरीश धनदेव की नवाचार वाली सोच, जोखिम लेने की क्षमता और जमकर मेहनत करने का नतीजा है।

गांव धायसर के रहने वाले हैं हरीश धनदेव
हरीश धनदेव राजस्थान में भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित जैसलमेर जिले के चेलक गांव के रहने वाले हैं। वन इंडिया हिंदी से बातचीत में हरीश ने अपनी सरकारी नौकरी से लेकर विदेशों में कृषि उत्पाद सप्लाई करने वाला किसान बनने तक का पूरा सफर बयां किया।

पिता भी रहे चुके हैं इंजीनियर
जैसलमेर जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर गांव चेलक के रूपाराम धनदेव व जतना देवी के घर पांच बेटियों के बाद 18 मई 1989 को बेटे का जन्म हुआ। नाम रखा हरीश धनदेव। राजस्थान पीएचईडी में चीफ इंजीनियर पद से रिटायर हुए रूपाराम धनदेव का बेटा भी उन्हीं के नक्शे कदम पर चला और इंजीनियर बना।

जैसलमेर नगर परिषद में लगे थे जूनियर इंजीनियर
हरीश धनदेव ने शुरुआती पढ़ाई जैसलमेर से की और फिर जयपुर से सिविल इंजीनियर की डिग्री प्राप्त की। साल 2013 में इंजीनियरिंग करने के साथ ही हरीश की सरकरी नौकरी लग गई। हरीश ने जैसलमेर नगर परिषद में जूनियर इंजीनियर पद पर ज्वाइन किया। शुरुआत में करीब 15 हजार रुपए मासिक तनख्वाह मिली करती थी।

छह माह में ही छोड़ दी सरकारी नौकरी
पिता के नक्शे कदम पर चलकर हरीश सरकारी नौकरी तो लग गया, मगर वह दिल से चाहता था कि दादा चोखाराम की तरह किसान बने। यही वजह है कि महज छह माह बाद ही हरीश ने जैसलमेर नगर परिषद के जूनियर इंजीनियर की सरकारी नौकरी छोड़ दी और खेतों का रुख किया।

70 फीसदी जमीन खुद की
हरीश ने बताया कि धायसर व इसके आस-पास के गांवों में करीब 900 बीघा जमीन पर वे खेती कर रहे हैं। इसमें से 70 फीसदी जमीन खुद की है। इसमें एलोविरा, मोरिंगा और अनार की खेती की जा रही है। जैतून की खेती की भी खेती का प्लान है।

ओमान सबसे बड़ा खरीददार
हरीश कहते हैं कि उनके खेत में एलोविरा की डिमांड भारत के साथ-साथ विदेशों में भी है। 30 फीसदी उत्पाद एक्सपोर्ट किए जाते हैं। सबसे अधिक खाड़ी देशों में जाते हैं। इनमें सबसे बड़ा खरीददार ओमान है। इसके अलावा भारतीय बाजारों में पतंजलि हरिद्वार व हिमाचल प्रदेश में काफी डिमांड है।

शुरुआत दस हजार पौधों से
बता दें कि हरीश के दादा चोखाराम जौ, गेहूं व बाजरा आदि के रूप में परम्परागत खेती किया करते थे। हरीश ने लीक हटकर खेती करने की ठानी और बीकानेर स्थित कृषि विश्वविद्यालय गए। वहां पर एलोविरा की खेती की पूरी प्रक्रिया समझी और करीब 40 हजार रुपए खर्च करके एलोविरा के 10 हजार पौधे लेकर आए।
एलोविरा के 10 हजार पौधे से शुरू हुआ हरीश का सफर अब 20 लाख पौधों तक पहुंच चुका है। हरीश के खेत में 10 नलकूप से बूंद बूंद सिंचाई से एलोविरा की खेती की जा रही है। करीब सौ कर्मचारी खेत में काम करते हैं।












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