दादा की 40 साल पुरानी निशानी झोंपड़े को पोते ने हाईड्रो मशीन से अपने मकान के पास करवाया शिफ्ट
दादा की 40 साल पुरानी निशानी झोंपड़े को पोते ने हाईड्रो मशीन से अपने मकान के पास करवाया शिफ्ट
बाड़मेर, 19 जनवरी। राजस्थान में दिल के झरोखे सी हवेलियों और पुरखों की याद दिलाते जोहड़ों के सहेजने के मामले तो अक्सर सामने आते रहते हैं, मगर अब बाड़मेर से दिल को छू लेना वाला किस्सा सामने आया है।

झोंपड़ा चालीस साल पुराना
यहां पर अपने दादा द्वारा बनाए गए झोंपड़े (झुंपा) को बचाने के लिए पोते ने शानदार कदम उठाया है। चालीस साल पुराने झोंपड़े को पोते ने हाइड्रो मशीन की मदद से उठवाकर अपने पक्के मकान के पास शिफ्ट करवाया है।

गांव करडाली नाडी बाड़मेर राजस्थान
मामला राजस्थान के बाड़मेर जिले के सिणधरी उपखंड के करडाली नाडी गांव का है। यहां के पुरखाराम के दादा ने 40 साल पहले साल झुंपा बनवाया था, जो किसी वातानुकूलित कमरे के कम नहीं था।

शिफ्ट करने में आया छह हजार का खर्च
मीडिया से बातचीत में पुरखाराम कहते हैं कि 6 हजार रुपए खर्च करके झोंपड़ा शिफ्ट करने की दो वजह हैं। एक तो यह कि झोंपड़ा मेरे दादा की निशानी है और दूसरा ये कि आजकल ऐसा झोंपड़ा कोई दूसरा नहीं बना सकता।

तीस साल और रह सकता है सुरक्षित
चालीस साल पहले बना यह झोंपड़ा आज भी सुरक्षित है, मगर इसकी नींव कमजोर हो गई थी। अब नई जगह शिफ्ट करने से नींव भी मजबूत हुई है। आगामी 30 साल तक सुरक्षित रह सकता है। जगह बदलते समय झोंपड़ा पूरा बिखर नहीं जाए इसलिए उसको हाइड्रा क्रेन की मदद से उठाया है।

नया झोपड़ा बनाने में खर्च होते हैं 80 हजार
सिणधरी उपखंड के करडाली नाडी गांव के लोग कहते हैं कि झोंपड़े बनाने वाले लोग गिनते के बचे हैं। हाइड्रा क्रेन से शिफ्ट करने में सिर्फ 6 हजार रुपए लगे हैं जबकि नया झोंपड़ा बनाने में 80 हजार रुपए की लागत आ जाती है।

आने वाली पीढ़ियों को दिखाना है झुंपा
पुखराज ने रेगिस्तान में पड़ने वाली गर्मी को देखते हुए झोंपे को मकान से करीब 80 मीटर की दूरी पर पेड़ के नीचे शिफ्ट किया है। गर्मी में यह झोंपड़ा एयरकंडीशनर की तरह राहत नहीं देता। बुजुर्गों की विरासत को संजोए रखने के लिए इसको घर के पास शिफ़्ट किया है। आने वाली पीढ़ियां इस झोंपे को देखें और बुजुर्गों को याद कर सकें।

कैसे बनता है झोपड़ा?
राजस्थान के गांवों में जमीन से मिट्टी खोदकर, पशुओं के गोबर को मिक्स करके दीवारें बनाई जाती हैं। इन मिट्टी की दीवारों के ऊपर बल्लियों व लकड़ियों से छप्परों के लिए आधार बनाया जाता है। आक की लकड़ी, बाजरे के डोके (डंठल), खींप, चंग या सेवण की घासों से छत बनाई जाती है। झोंपें के अंदर का फर्श गोबर का बना होता है।












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