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Rajasthan News: करौली का दिव्यांग लाइसेंस के लिए छह महीने से दफ्तरों का काट रहा चक्कर, आखिर कौन सुनेगा फरियाद

Rajasthan News: राजस्थान के करौली जिले की मंडरायल तहसील स्थित गढ़ी का नकटीपुरा के रहने वाले दिव्यांग भूपेंद्र मीणा पिछले 6 महीने से अपनी कार के रजिस्ट्रेशन और ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। लेकिन भूपेंद्र की कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। सड़क हादसे में दोनों हाथ गंवाने के बाद भी भूपेंद्र ने जिंदगी से जंग नहीं हारी। अपना हौंसला बुलंद रखते हुए उन्होंने कार चलाना सीखा। रोजगार और घर चलाने के लिए जैसे-तैसे पैसे जुटाकर भूपेंद्र ने कार खरीदी। अब भूपेंद्र कार का रजिस्ट्रेशन करवाने और लाइसेंस बनवाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। लेकिन उन्हें कहीं से कोई राहत नहीं मिल रही है।

साल 2013 में सड़क हादसे में गंवाए दोनों हाथ

भूपेंद्र मीणा साल 2013 में गांव के मुहाने पर खड़े होकर अपने मामा से बात कर रहे थे। इसी दौरान एक बस ने भूपेंद्र को अपनी चपेट में ले लिया। बस उन्हें घसीटते हुए 10 फीट दूर तक ले गई। इस हादसे भूपेंद्र ने अपने दोनों हाथ गंवा दिए। इलाज के लिए उन्होंने तत्कालीन वसुंधरा सरकार से मदद भी मांगी। लेकिन उतनी राहत नहीं मिल सकी। भूपेंद्र को केरल में हाथ ट्रांसप्लांट करने की जानकारी मिली। वे अपने पिता के साथ केरल भी गए। लेकिन इलाज में 18 लाख रुपए का खर्चा सुनने के बाद पिता-पुत्र की जमीन खिसक गई। इतना महंगा इलाज जमीन-जायदाद और घर-बार बेचकर भी संभव नहीं था। लिहाजा बाप बेटे हताश होकर लौट आए।

bhoopendra meena

इंदौर के दिव्यांग ने दिखाई जीने की राह

इलाज को लेकर हताश हुए भूपेंद्र के पास अब जिंदगी से हार मानने के सिवा कोई रास्ता नहीं था। इसी दौरान भूपेंद्र की पहचान इंदौर निवासी दिव्यांग विक्रम अग्निहोत्री से हुई। दरअसल विक्रम अग्निहोत्री दिव्यांगों के लिए मोटिवेशन और रोजगार की राह दिखाने का काम करते हैं। विक्रम अग्निहोत्री खुद दिव्यांग होते हुए कार चलाते हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने भूपेंद्र को कार चलाना सीखने और कार चलाकर रोजगार कमाने की सलाह दी। विक्रम की इस बात ने भूपेंद्र को नया हौंसला दिया। उन्होंने पहले कार चलाना सीखा। इसके बाद जैसे-तैसे पैसे जुटाकर अपने लिए ऑटोमेटिक स्विफ्ट डिजायर कार फाइनेंस पर खरीदी। उन्होंने कार में अपने मुताबिक कुछ मोडिफिकेशन भी कराए। अब भूपेंद्र कार के रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस बनने का इंतजार कर रहे हैं। ताकि अपनी और परिवार की आजीविका चला सके।

हादसे से पहले बना हुआ था लाइसेंस

भूपेंद्र मीणा के पास सड़क हादसे से पहले खुद का लाइसेंस बना हुआ था। लेकिन सड़क हादसे के बाद परिवहन विभाग ने उसे लाइसेंस को रद्द कर दिया। परिवहन विभाग का कहना था कि वह अब दिव्यांग हो चुके हैं। ऐसे में उन्हें दूसरा लाइसेंस बनवाना पड़ेगा। अब भूपेंद्र पिछले 6 महीने से अपनी कर का रजिस्ट्रेशन करवाने और अपना लाइसेंस बनवाने के लिए परिवहन विभाग सहित सरकारी महकमें के चक्कर काट रहे हैं। हाल ही में भूपेंद्र ने इस मामले को लेकर भजन लाल सरकार में मंत्री किरोड़ी लाल मीणा से मुलाकात की है। लेकिन किरोड़ी लाल मीणा ने भी उन्हें आश्वासन ही दिया है।

देशभर में दिए जा रहे लाइसेंस

इंदौर के रहने वाले विक्रम अग्निहोत्री देश के पहले ऐसे दिव्यांग है। जिन्हें पैर से कार चलाने का लाइसेंस दिया गया। यह लाइसेंस उन्हें 2016 में दिया गया था। विक्रम अग्निहोत्री ने बताया कि उनके जरिए देशभर के अलग-अलग राज्यों में 20 दिव्यांग लोगों को लाइसेंस दिलवाए गए हैं। वे कहते हैं कि मोटर व्हीकल एक्ट साधारण और दिव्यांग लोगों के बीच कोई भेदभाव नहीं करता है। उसमें कुछ शर्तें हैं। जिन्हें पूरा करना होता है। जिसमें ओटोमेटिक कार और ड्राइविंग टेस्ट पास करने जैसी योग्यताएं शामिल हैं। यह अधिनियम पूरे देश में लागू होता है। इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि इस राज्य में लाइसेंस दिया जा रहा है तो दूसरे राज्य में नहीं दिया जाएगा। यह सभी राज्यों में समान रूप से लागू है। ऐसे में लाइसेंस जारी करने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।

स्थानीय प्रशासन ने खड़े किए हाथ

भूपेंद्र मीणा अपनी फरियाद लेकर करौली के जिला कलेक्टर से भी मिले। लेकिन उन्हें वहां से भी कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला। परिवहन विभाग के अधिकारियों ने तो उन्हें साफ इंकार कर दिया कि वे उनको लाइसेंस जारी नहीं कर सकते हैं। अब भूपेंद्र इसे लेकर जयपुर में सत्ता के गलियारों के चक्कर काट रहे हैं। भूपेंद्र के पिता किसान हैं। भाई बहनों में वे सबसे छोटे हैं। भूपेंद्र की कार पिछले सात महीने से घर पर ही खड़ी है। उन्हें पैसों का जुगाड़ कर किश्ते चुकानी पड़ रही है। भूपेंद्र को उम्मीद है कि उनकी कार का रजिस्ट्रेशन होकर उन्हें लाइसेंस मिल जाए तो वे कार चलाकर रोजी-रोटी कमा सकें।

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