रेगिस्तान का नया 'ATM': चंदन से महकेगी चूरू की महिला-युवाओं की किस्मत! राजस्थान में खुला कुबेर का खजाना

Churu Sandalwood Farming: राजस्थान का मरुस्थलीय जिला चूरू अब केवल भीषण गर्मी और कड़ाके की सर्दी के लिए ही नहीं, बल्कि चंदन की खेती की नई पहल के लिए भी चर्चा में है। जहां एक ओर गर्मियों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और सर्दियों में पारा शून्य के करीब चला जाता है। वहां अब इसी रेतीली जमीन पर सफेद चंदन उगाने की तैयारी शुरू हो चुकी है।

  • क्या आप जानते हैं कि चंदन का एक परिपक्व पेड़ 12-15 साल में ₹3 लाख से ₹5 लाख तक दे सकता है?
  • चूरू की रेतीली मिट्टी में 'सफेद चंदन' (Santalum album) के लिए जरूरी जल निकासी (Drainage) प्राकृतिक रूप से मौजूद है, जो इसे दक्षिण भारत से भी बेहतर विकल्प बनाती है।
  • इस स्कीम का सबसे बड़ा हिस्सा 'सेल्फ हेल्प ग्रुप्स' (SHGs) को दिया गया है, जो राजस्थान के ग्रामीण सशक्तीकरण की नई तस्वीर है।

इस पहल को किसानों के लिए भविष्य की बड़ी कमाई और गांवों में रोजगार बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। सामाजिक संस्था रिहाई ने किसानों और ग्रामीण कार्यकर्ताओं को जागरूक करने के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू कर दिए हैं। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो चूरू की पहचान बदल सकती है और यहां की जमीन चंदन की खुशबू से महक सकती है।

मरुस्थल में चंदन उगाने की तैयारी

कृषि वानिकी योजना के तहत जिले में चंदन की खेती को बढ़ावा देने की शुरुआत हो चुकी है। संस्था रिहाई गांव-गांव जाकर किसानों को इसके फायदे और खेती की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दे रही है। किसानों को बताया जा रहा है कि सही तकनीक और वैज्ञानिक तरीके अपनाकर मरुस्थल जैसी कठिन जलवायु में भी चंदन के पौधे सफलतापूर्वक उगाए जा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चूरू की रेतीली मिट्टी और शुष्क मौसम इस खेती के लिए चुनौती जरूर हैं, लेकिन उचित देखभाल के जरिए इसे सफल बनाया जा सकता है।

लंबी अवधि में बड़ी कमाई की उम्मीद

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार चंदन की खेती को लंबी अवधि का निवेश माना जाता है। शुरुआत में किसानों को धैर्य और देखभाल दोनों की जरूरत होगी, लेकिन समय के साथ यह खेती बड़ी कमाई का जरिया बन सकती है। बताया जा रहा है कि 12 से 15 साल के भीतर पौधे पूरी तरह तैयार हो जाते हैं और उनकी लकड़ी की बाजार में काफी ऊंची कीमत मिलती है। इसी वजह से कई किसान अब पारंपरिक खेती के साथ चंदन की खेती को भी भविष्य के विकल्प के रूप में देखने लगे हैं।

चंदन के पौधों को चाहिए सहारा

चंदन का पौधा सामान्य पौधों की तरह पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं होता। यह दूसरे पौधों की जड़ों से पोषण प्राप्त करता है, इसलिए इसके साथ कुछ विशेष पौधों को लगाना जरूरी होता है। अरहर, लाल मेहंदी, मालवर नीम, सहजन और पपीता जैसे पौधों को होस्ट प्लांट के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ये पौधे चंदन की जड़ों को जरूरी पोषण देने में मदद करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सही होस्ट प्लांट के बिना चंदन की खेती सफल होना मुश्किल हो सकता है।

ड्रिप सिंचाई को माना सबसे बेहतर

चूरू जैसे इलाके में पानी की कमी सबसे बड़ी चुनौती मानी जाती है। इसी वजह से विशेषज्ञ ड्रिप सिंचाई को सबसे उपयोगी तरीका बता रहे हैं। इस तकनीक से कम पानी में पौधों तक सीधे नमी पहुंचाई जा सकती है और पानी की बर्बादी भी नहीं होती। जानकारी के मुताबिक गर्मियों के मौसम में एक पौधे को प्रतिदिन करीब आठ लीटर पानी की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में ड्रिप सिस्टम खेती की लागत और पानी दोनों को नियंत्रित करने में मदद करेगा।

कार्यकर्ताओं को दिया गया प्रशिक्षण

चंदन खेती की शुरुआत से पहले रिहाई संस्था ने अपने क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं और समन्वयकों को विशेष प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण के दौरान खेती से जुड़ी बारीकियों, पौधों की देखभाल और सही तकनीक के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। 'खेत खेजड़ी तौरई अभियान' के संयोजक एडवोकेट रामेश्वर प्रजापति के अनुसार मरुस्थल में चंदन की खेती की संभावनाएं काफी अच्छी हैं, लेकिन इसके लिए वैज्ञानिक पद्धति और सावधानी जरूरी होगी। पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार, रामेश्वर प्रजापति ने बताया कि मिट्टी और पानी की जांच के बाद ही पौधारोपण किया जाएगा ताकि खेती सफल हो सके।

पौधों की दूरी और देखभाल पर जोर

प्रशिक्षण के दौरान किसानों और कार्यकर्ताओं को यह भी समझाया गया कि चंदन के पौधों की सही दूरी बनाए रखना बेहद जरूरी है। हर पौधे के दोनों तरफ लगभग चार-चार फीट की दूरी पर मदर प्लांट लगाने की सलाह दी गई है। शुरुआती तीन वर्षों को सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसी दौरान पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और उनकी बढ़त तय होती है। इस समय नियमित सिंचाई, निगरानी और देखभाल पर विशेष ध्यान देना होगा।

एक एकड़ में 500 तक पौधे

रिहाई संस्थान के भंवर रुइल ने बताया कि यह परियोजना रिहाई और इनोवेशन इंडिया ट्रस्ट के संयुक्त प्रयास से संचालित की जाएगी। इसमें सरकार से मान्यता प्राप्त नर्सरी और स्थानीय किसानों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने बताया कि एक एकड़ जमीन में करीब 400 से 500 चंदन के पौधे लगाए जा सकते हैं। यदि खेती सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में यह किसानों के लिए आय का मजबूत स्रोत बन सकती है।

कटाई के लिए होगी अनुमति प्रक्रिया

चंदन की खेती से जुड़े कानूनी नियमों की जानकारी भी किसानों को दी जा रही है। पौधों की कटाई और उनकी बिक्री के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत अनुमति लेना जरूरी होगा। इसके लिए किसानों को पहले पंजीयन प्रक्रिया पूरी करनी होगी। संस्था का कहना है कि खेती शुरू करने से पहले ही किसानों को सभी सरकारी नियमों और प्रक्रियाओं की जानकारी दी जा रही है ताकि आगे किसी तरह की परेशानी न हो।

NTMS पोर्टल की दी गई जानकारी

परियोजना के तहत किसानों और कार्यकर्ताओं को वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एनटीएमएस पोर्टल की जानकारी भी दी गई। प्रशिक्षण कार्यक्रम में पंजीयन प्रक्रिया और उससे मिलने वाले लाभों को विस्तार से समझाया गया। संस्था के प्रबंध निदेशक फुलाराम, सहायक निदेशक सुमन कंवर और जीवराज कस्वां लालासर ने सरदारशहर, चूरू, रतनगढ़ और तारानगर क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देकर खेती की पूरी प्रक्रिया की जानकारी दी।

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