Girdhar Singh Randa : 21 बार फेल होने के बाद बना अफसर, घर में गरीबी ने ले ली थी 4 सदस्यों की जान
बाड़मेर, 27 अगस्त। बार-बार की असफलता के बाद इंसान बिखर सा जाता है, मगर आखिर में निखरता वो ही है जो अपनी असफलता से सीख लेता है। इस बात का उदाहरण है गिरधर सिंह रांदा की जिंदगी।

22वें प्रयास में सफल हुए गिरधर सिंह रांदा
रांदा वो शख्स है, जो लगातार 21 परीक्षाओं में फेल हुआ है, मगर कभी हार नहीं मानी। ना ही मेहनत करना छोड़ा। नतीजा यह है कि 22वें बार के प्रयास में रांदा अफसर बन गया। अपने परिवार व रिश्तेदारी में सरकारी नौकरी लगने वाला इकलौता शख्स है।

गिरधर सिंह रांदा का इंटरव्यू
वन इंडिया हिंदी से बातचीत में खुद रांदा ने अपनी परिवार की गरीबी, जिसने चार सदस्यों की जान ले ली। प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार की असफलताओं से कुछ सीख लेकर फिर आगे बढ़ने और कामयाबी हासिल करके ही मानने तक ही पूरी कहानी शेयर की है।

कौन हैं गिरधर सिंह रांदा?
बता दें कि गिरधर सिंह रांदा राजस्थान के बाड़मेर जिले के गांव उण्डखा के रहने वाले है। ग्राम विकास अधिकारी यानी ग्राम सेवक पद पर बाड़मेर के बालेरा गांव में सेवा दे रहे हैं। 1 जुलाई 1993 को इनका जन्म किसान बसंत सिंह व एवन कंवर के घर हुआ। इनके दो भाई व चार बहन हैं। एक भाई की मौत हो चुकी है।

गिरधर सिंह रांदा की शिक्षा
गिरधर सिंह रांदा ने आठवीं तक की पढ़ाई अपने गांव उण्डखा के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय से की। फिर 12वीं कक्षा गांव बराणी के राजकीय उच्च माध्यमिक और बीए बाड़मेर के सरकारी कॉलेज से किया। इसके बाद प्रतियोगी परीक्षाओं में जुट गए।

इन 21 परीक्षाओं में हुए फेल
कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 2013 से राजस्थान रोडवेज कंडक्टर, होमगार्ड, खनिज विभाग पुलिस कांस्टेबल, बैंक ऑफ चपरासी, बैंक पीओ, वनपाल, वनरक्षक, पटवारी, एलडीसी, ग्राम पंचायत सहायक समेत कुल 21 परीक्षा दी। सभी में फेल हुए। राजस्थान ग्राम सेवक 2016 भर्ती परीक्षा में सफल हुए।

इन सदस्यों ने की खुदकुशी
गिरधर सिंह रांदा कहते हैं कि परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। गरीबी के कारण आए दिन कलह रहती थी। पहले दादी उगर कंवर ने फांसी लगाकर जान दी। पांच साल बाद चाचा भूरसिंह ने जहर खा लिया। दूसरे चाचा रायसिंह ने फांसी लगा ली और साल 2013 में बड़े भाई रघुमान सिंह ने केरोसिन डालकर आत्मदाह कर लिया।

ताने मारते, मेरा उदाहरण देते हैं-रांदा
गिरधर सिंह रांदा कहते हैं कि अब लोग भले ही मेरी कायमाबी को लेकर कभी हार नहीं मानने की मिसाल देते हैं, मगर एक समय वो भी था जब आस-पास के लोग अपने बच्चों से कहा करते थे कि ज्यादा पढ़-लिखकर क्या करोगे। गिरधर को देखो कितनी परीक्षाएं दे लीं, मगर अभी तक नौकरी नहीं लगा।












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