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छत्तीसगढ़ में है एक गांव जहां 100 साल से नहीं हुआ होलिका दहन !

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रायपुर, 16 मार्च। होली का त्यौहार आ चुका है। कल पूरे देश में होलिका दहन होगा और परसों रंग खेला जायेगा। वही होली के दिन छत्‍तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के लालपुर इलाके में लोग एक अनजान खौफ को मन में पाले घरों के भीतर दुबके रहेंगे। रायपुर के लालपुर इलाके में लगभग 100 साल से भी ज्यादा वक़्त से होलिका दहन नहीं किया गया है। लालपुर में मान्यता है कि अगर होलिका दहन किया गया ,तो महामारी का प्रकोप सहना पड़ सकता है।

holika dahan

लालपुर के ग्रामीणों के मुताबिक बरसों पहले एक बार गांव की मान्यताके खिलाफ जाकर होलिका दहन करने का प्रयास किया गया था, तब गांव में आगजनी हो गई थी। आग के चपेट में आकर किसानों के खेेत और मवेशी स्वाहा हो गए थे। गांव में जब भी किसी ने होलिका दहन करने का प्रयास किया ,तो उसके घर कोई ना कोई अनहोनी जरूर घटी ,इसलिए इस इलाके में होलिका दहन को वर्जित माना जाता है।

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लालपुर के लोगो के मुताबिक उनके गांव को कुंवारीगढ़ भी कहा जाता है। सदियों पहले घूमने फिरने वाली बंजारा जाति के लोगो ने अपने प्रवास के दौरान यहां बिझवारिन देवी का मंदिर स्थापित किया था। जिसे लोग कुंवारी देवी मानकर पूजा करते हैं। गांव के लोग मानते हैं कि कुंवारी देवी उनके गांव की रक्षा करती हैं। होलिका दहन के दिन लालपुर के लोग अपनी रक्षक देवी की पूजा करके रंग और गुलाल खेलते हैं।लालपुर की महिलाओं का कहना है कि गांव में जब भी शादी,जन्मोत्सव या कोई अन्य उत्सव होता है,तो लोग सबसे पहले कुंवारी माता का आशीर्वाद लेने मंदिर जाते हैं।

गांव के बुजुर्ग बताते है कि उनके गांव के लोग होली में रंग जरूर खेलते हैं , लेकिन होलिका दहन नहीं करते। माना जाता है कि होलिका दहन करने से कुंवारी देवी नाराज हो जाती है और गांव में अनहोनी घटती है,इसलिए इस गांव में लोग होलिका दहन नहीं करते ।

बताते हैं की दीपावली में होनी वाली गौरी-गौरा की पूजा भी कुंवारी माता के मंदिर की परिक्रमा के साथ शुरू होती है। इस दौरान गांव के बुजुर्ग नई पीढ़ी को समझाते हैं कि जब होली का त्यौहार आये,तो भूलकर भी होलिका दहन न करें और यह जानकारी अगली पीढ़ी तक ले जाएं।

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धमतरी और दुर्ग में भी होली के रंग आते हैं फीके नजर

छत्तीसगढ़ में लालपुर ही एकलौती जगह नहीं है ,जहां होली के त्यौहार में रंग फीके नजर आते हैं। दुर्ग जिले के ग्राम गोंड़पेंड्री में भी होली की रौनक नहीं देखी जाती। दरअसल कई सालों पहले इस गांव में होलिका दहन के दौरान कुछ लोगों के बीच हुए विवाद ने बेहद ही हिंसक रूप ले लिया था। तब गांव के बुजुर्गो ने फैसला लिया था कि गांव में ना तो होलिका दहन होगा ,ना ही रंग खेला जायेगा।

वहीं राज्य के धमतरी जिले के पास के तेलीनसत्ती नाम के एक गांव में भी अनहोनी की आशंका चलते होली का त्यौहार नहीं मनाया जाता है। गांव की मान्यता के अनुसार लगभग 12वीं सदी में गांव के व्यक्ति की तालाब का पानी रोकने के दौरान मौत हो गई थी , पति के शोक में उसकी पत्नी ने खुद को सती कर लिया था। उसी समय से तेलीनसत्ती गांव में लोग होलिका और रावण दहन नहीं करते। इतना ही नहीं इस गांव में मृत्यु के बाद शवदाह भी नहीं किया जाता। अगर किसी को शवदाह करना है तो उसे गांव की सीमा के बाहर जाकर अंतिम संस्कार करना होता है।

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