छत्तीसगढ़ में 'दृष्टिदोष' से पीड़ित हैं 20 हजार स्कूली बच्चे

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रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों में दृष्टिदोष लगातार बढ़ता चला जा रहा है। राष्ट्रीय अंधत्व निवारण समिति द्वारा प्रदेश में चलाए जा रहे 'स्कूल आई स्क्रीनिंग प्रोग्राम' में सत्र 2013-14 (जनवरी तक) में 11 लाख स्कूली छात्रों की आंख जांच की गई, जिनमें 17 हजार 571 छात्रों में दृष्टिदोष पाया गया है, जिन्हें चश्मा वितरण किया जा चुका है।

यह स्थिति सिर्फ सरकारी स्कूलों के 11 लाख छात्रों की जांच में सामने आई है, जबकि सूबे के प्राइमरी और मिडिल स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या करीब 47 लाख है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब सभी छात्रों की जांच होगी तो आंकड़े कहां पहुंच जाएंगे।

छत्तीसगढ़ राज्य अंधत्व निवारण समिति के प्रभारी डा. सुभाष मिश्रा कहते हैं, "प्रदेश में संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, इसकी वजह सियूडोमायोपिया है। इसका मतलब है कि आज बच्चे इलेक्ट्रानिक चीजों से चिपके रहते हैं। जो चिंता का विषय है। इस सत्र में अप्रैल से जनवरी तक हम साढ़े सत्रह हजार चश्मे बांट चुके हैं। आंकड़ा 20 हजार से ऊपर जाएगा। ये सिर्फ प्राइमरी और मिडिल सरकारी स्कूल में हुई जांच का आंकड़ा है।"

छत्तीसगढ़ के स्कूली छात्रों की आंख जांच अभियान के बाद सामने आ रहे नतीजों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी चिंता के रूप में देखा जा रहा है। अब तक प्रदेश में हुई जांच पर राज्य अंधत्व निवारण समिति के राज्य प्रभारी डॉ. सुभाष मिश्रा ने विश्लेषण कर पेपर तैयार किया है। जिसे छत्तीसगढ़ स्टेट ऑफथेलमोलॉजी सोसाइटी ने बेस्ट पेपर का अवार्ड दिया है, साथ ही मिश्रा को ऑल इंडिया ऑफथेलमोलॉजी सोसाइटी ने भी पेपर प्रस्तुतिकरण के लिए आमंत्रित किया है।

11 लाख छात्रों की जांच में सामने आई बीमारी

उल्लेखनीय है कि प्रदेश में 37710 प्राइमरी स्कूल हैं, जिनमें 31 लाख 11 हजार स्कूली छात्र हैं। जबकि मिडिल स्कूल में करीब 16 लाख 22 हजार छात्र अध्ययनरत हैं। यह आंकड़ा सत्र 2012-13 का है। इस सत्र में 'स्कूल आई स्क्रीनिंग प्रोग्राम' के तहत राजीव गांधी शिक्षा मिशन के साथ 16.53 लाख छात्रों की आंख जांच की गई। इनमें 13 हजार 228 छात्रों को नि:शुल्क चश्मा वितरण किया गया। इनमें 208 छात्रों को मोतियाबिंद, 123 को जन्मजात और 83 की आंखों की रोशनी चोट की वजह से कम हुई। इस सत्र में अब तक हुई जांच में 17 हजार 571 चश्मे बांटे जा चुके हैं।

जानकारी के मुताबिक छत्तीसगढ़ में प्राइमरी और मिडिल स्कूल के छात्रों के लिए संचालित मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम में सालाना 100 करोड़ रुपए खर्च होता है। ऐसे में क्या छात्रों की आंखों का कमजोर होना इस बात की ओर इशारा करता है कि खाद्य सामग्री में विटामिन की मात्रा कम है। जानकार मानते हैं कि ज्यादा से ज्यादा उन खाद्य सामग्रियों का इस्तेमाल करना चाहिए जिनमें इन दो पोषक तत्वों की मात्रा भरपूर हो। क्योंकि मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम का पहला उद्देश्य अगर बच्चों को स्कूल की तरफ खींचना है तो दूसरा उन्हें स्वस्थ भी बनाना है।

सूबे की सीनियर डायटिशियन डा. अरुणा पल्टा का कहना है कि आज बच्चों की दिनचर्चा सुबह देर से उठना और रात में देर से सोना हो गई है। घंटों आधुनिक उपकरणों जैसे कम्प्यूटर, मोबाइल के साथ खेलना, जो बच्चे खेलते हैं उन्हें तो चश्मा चढ़ता है जो पढ़ते हैं उन्हें भी।

उन्होंने कहा कि एक कारण यह भी है कि आज ताजा खाना अव्वल तो मिलता नहीं हैं, मिलता भी है तो बच्चे पसंद नहीं करते। वे फास्ट फूड खाते हैं। माता-पिता भी डाइट का ख्याल नहीं रखते। विटामिन-ए आंखों की रोशनी बढ़ता है, इसलिए ऐसी ही खाद्य सामग्री खानी चाहिए। बहरहाल प्रदेश में सियूडोमायोपिया ग्रसित बच्चों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होना चिंता का विषय बन गया हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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