किसान आंदोलन के नौ महीने के बाद भी क्यों नहीं निकल रहा निष्कर्ष, पढ़िए किसान नेता की ज़ुबानी

किसान आंदोलन में करीब 650 किसान शहीद हो गए, पचास हज़ार से ज्यादा मुक़दमे दर्ज हुए, आर्थिक नुक़सान सहने के बावजूद आज भी किसान आंदोलन कर रहे हैं। किसानों के आंदोलन की सबसे बड़ी कमज़ोरी शीर्ष किसान मोर्चा का कमज़ोर नेतृत्व

चंडीगढ़, अगस्त 28, 2021। किसान आंदोलन के 9 महीने पूरे हो चुके हैं लेकिन किसान अभी तक अपनी हक़ के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। किसान आंदोलन किस वजह से कामयाब नहीं हो पा रहा है इस मुद्दे पर वन इंडिया हिन्दी के साथ अखिल भारतीय स्वामिनाथन संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष विकल पचार ने बेबाकी से अपने पक्ष रखे।

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    किसान आंदोलन के नौ महीने के बाद भी क्यों नहीं निकल रहा निष्कर्ष, पढ़िए किसान नेता की ज़ुबानी
    vikal pachar vs rakesh tikait

    650 किसान शहीद, 50 हज़ार मुक़दमे दर्ज
    विकल पचार ने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े और ऐतिहासिक आंदोलन के नौ महीने पूरे हो चुके हैं। आंदोलन से लगातर पहले दिनों से जुड़े होने की वजह से अगर अंदोलन की कमियों और ताक़तों का विश्लेषण करें तो आंदोलन का सबसे मज़बूत स्तंभ देश के किसान हैं।

    किसान आंदोलन में करीब 650 किसान शहीद हो गए, पचास हज़ार से ज्यादा मुक़दमे दर्ज हुए, आर्थिक नुक़सान सहने के बावजूद आज भी किसान आंदोलन कर रहे हैं। वहीं विकाल पचार ने कहा कि किसानों के आंदोलन की सबसे बड़ी कमज़ोरी शीर्ष किसान मोर्चा का कमज़ोर नेतृत्व है।

    उन्होंने कहा कि किसान मोर्चा का कमज़ोर नेतृत्व इसलिए कहा कि जब 26 नवंबर 2020 को दिल्ली के बॉर्डर को सिंधू बॉर्डर और टिकरी बॉर्डर से घेरा था उसके बाद किसान मोर्चा के घटिया नेतृत्व की वजह से किसानों की फ़ौज को दिल्ली की ओर संसद का घेराव, प्रधानमंत्री आवास का घेराव करने की बजाए लगातार वापस भेजा गया। कभी चंडीगढ़ भेजा गया कभी हिसार भेजा गया। कभी टोहाना महापंचायत में भेजा गया। हरियाणा में पंचायत की गई जिससे बॉर्डर पर के किसान हरियाणा की ओर कूच कर गए। इसी तरह पंजाब के गन्ना आंदोलन में हुआ जो किसान पंजाब से दिल्ली बॉर्डर पर आए थे उन्हें वापस बुला लिया गया। दिल्ली की तरफ़ एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ाया गया।

    कमज़ोर स्थिति में किसान आंदोलन
    विकाल पचार ने कहा कि आंदोलन को लंबा खीचने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा यूपी के मुज़फ़्फ़रनगर में महापंचायत आयोजित कर रही है। हरियाणा में भी महापंचायतें हुई थी जो कि पूरी तरह से विफल रही थी।

    महापंचायत की वजह से आंदोलन आज बहुत कमज़ोर स्थिति में है। इस तरह से दोबारा महापंचायत का प्रयोग करने का मतलब ये है कि किसान नेता ठीक नहीं हैं, वो आंदोलन को जानबूझकर लंबा खींचना चाहते हैं ताकि उन्हें राजनीतिक और आर्थिक लाभ मिल सके।

    26 जनवरी से पहले दो महीने के अंदर-अंदर सरकार को वार्ता के लिए 12 बार मजबूर किया चार में से दो मांगे पूरी करवाई। 26 जनवरी के बाद लगातार सात महीने घटिया फैसले लेने के बाद अभी तक सरकार को एक बार भी बात करने के लिए मजबूर नहीं कर सके। विकल पचार ने कहा कि 9 महीने पूरे होने के बाद किसान नेता जिन्हें भगवान माना जाता था उनकी मंशा जग ज़ाहिर हो चुकी है। बलवीर राजेवाल पंजाब के 31 साथियों के साथ दिल्ली की बॉर्डर पर किसान आंदोलन में मजबूरी की तहत शामिल हुए थे। वह अपने साथियों के साथ हरियाणा में ही रहना चाहते थे। वह पंजाब में कांग्रेस के फंडिंग से काम कर रहे थे।

    'सरकारी एजेंट बनकर आंदोलन में होते हैं शामिल'
    वन इंडिया हिंदी से बात करते हुए विकल पचार ने किसान नेता राकेश टिकैत सहित, योगेन्द्र यादव औऱ दर्शन पाल किसी भी आंदोलन में सरकार के एजेंट के तौर पर काम करने का आरोप लगाया।

    विकाल पचार ने कहा कि यह सभी लोग देश के किसी भी आंदोलन में सरकार के एजेंट बन कर शामिल होते हैं और राजनीतिक और आर्थिक लाभ लेकर आंदोलन को विफल कर किनारा पकड़ लेते हैं।

    उन्होंने कहा कि योगेन्द्र यादव ने अपनी पार्टी बनाई चुनाव लड़कर भी देखा उन्हें सौ से ज़्यादा वोट कहीं भी नहीं मिले इसके बावजूद भी वह देश में किसी भी आंदोलन में शरीक होकर सरकारी एजेंट के तौर पर काम करते हुए आंदोलन को विफल कर वापस हो जाते हैं।

    किसान नेता राकेश टिकैत पर निशाना
    विकल पचार ने राकेश टिकैत पर भी जमकर निशाना साधते हुए कहा

    राकेश टिकैत किसानों को बहलाने और फुसलाने के लिए मुज़फ़्फ़रनगर में महापंचायत कर रहे हैं। पिछले नौ महिने में महापंचायत नहीं की गई तो अब चुनाव के नज़दीक आते ही महापंचायत क्यों की जा रही है। इस आयोजन का साफ़ मतलब है कि विपक्ष के वोटों को बटोरना और भारतीय जनता पार्टी के सीधा लाभ पहुंचाना है। इसके लिए राकेश टिकैत हरियाणा और पंजाब से यूपी में भीड़ इकट्ठा करना चाहते हैं।

    विकल पचार ने कहा कि हरियाणा के साथी पहले महापंचायतों आर्थिक सहायता कर के टूट चुके हैं। इन्हें कह दिया जाए की बॉर्डर खाली कर दो तो किसान बॉर्डर खाली नहीं करेंगे मरते दम तक लड़ेंगे । इसलिए ही पंजाब के राजेवाल की टीम, रोकश टिकैत, योगेन्द्र यादव और दर्शन पाल लगातार कोशिश कर रहे हैं कि हरियाणा के किसानों को मुक़दमे के ज़रिए आर्थिक रूप से कमज़ोर कर बॉर्डरों से हटाया जाए। ये सभी लोग चाहते हैं कि आंदोलन 2022 तक चलता रहे ताकि उन्हें राजनीतिक और आर्थिक लाभ मिलता रहे।

    आंदोलन क्यों नहीं हो रहा सफ़ल ?
    विकल पचार ने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा आंदोलन होने के बावजूद ये आंदोलन सफ़लता की ओर नहीं जा रहा है क्योंकि रावण को हराने के लिए तो एक ही विभीषण काफ़ी था।

    किसान मोर्चे पर कई विभीषण बैठे हैं जिनकी कोई गिनती नहीं है। राकेश टिकैत, योगन्द्र यादव, राजेवाल और दर्शनपाल की मंडली किसानों को निश्चित तौर पर जीत दिलाने नहीं देगी।

    विकल पचार ने देश के सभी किसान संगठनों से एकजुट होने की अपील की उन्होंने कहा की सभी लोग ज़्यादा से ज़्यादा आंदोलन में शरीक हों और फ़ैसला करें की दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास का काफ़ी तादाद में घेराव करें। प्रधानमंत्री मजबूर हों देश के किसानों के लिए MSP एक्ट लाएं, तीनों कृषि क़ानूनों को रोकें।

    फरवरी 2022 के चुनाव के बाद बॉर्डरों पर राजेवाल, राकेश टिकैत, योगेन्द्र यादव और दर्शन पाल नहीं मिलेंगे। क्योंकि ये लोग राजनीतिक और बाहर से की गई फंडिंग को दबाने के लिए आंदोलन को 2022 तक खींच रहे हैं।

    विकाल पचार ने कहा कि कभी भी फ़ौज वापस नहीं मुड़ती हैं जीत के लिए आगे बढ़ती हैं। देश के किसान दिल्ली बॉर्डोरों पर आएं । और सरकार से वार्ता के लिए क़दम बढ़ाएं। संसद सत्र में अगर हम लोग लाखों की तादाद में जाते तो सरकार के साथ वार्ता होती और आंदोलन का हल निकल जाता। इसलिए देश के सभी किसान एकजुट होकर दिल्ली की तरफ़ कूच करें और आंदोलन को अंतिम रूप दें।

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