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Punjab Polls:क्यों अकाली-BSP गठबंधन को नजरअंदाज करना भूल है ? 1996 का इतिहास देखिए

चंडीगढ़, 16 फरवरी: पंजाब विधानसभा चुनाव को लेकर जितने भी ओपिनियन पोल आ रहे हैं, उनमें से ज्यादातर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में ही मुकाबला दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस की कमजोर स्थिति के बावजूद मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम चेहरा बनाने के बाद पार्टी की स्थिति में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है, क्योंकि वह दलित हैं और पंजाब में लगभग एक-तिहाई वोट यही समाज डालता है। लेकिन, इस सोच का एक दूसरा पहलू भी है। शिरोमणि अकाली दल और बसपा का गठबंधन। पंजाब की राजनीति में यह चुनावी जुगलबंदी एक बार जलवा बिखेर चुका है।

दलित मतदाता तय करेंगे पंजाब की सरकार !

दलित मतदाता तय करेंगे पंजाब की सरकार !

2011 की जनगणना के हिसाब से पंजाब में दलितों की जनसंख्या करीब 32% है। यह भारत के सभी राज्यों में सबसे अधिक है और देश की आबादी में उनके करीब 16.6% हिस्से से लगभग दोगुनी है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर और फिर चुनाव के दौरान उन्हें सीएम का चेहरा पेश करके बहुत बड़ी बाजी लगाई है। आमतौर पर राज्य की राजनीति में राजनीतिक तौर पर प्रभावी जाट सिखों का ही दबदबा रहा है, जो आबादी के मुकाबले में 20% ही हैं। यानी दलित नेता को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर कांग्रेस ने बहुत बड़ा कार्ड खेला है, जिसके बारे में माना जा रहा है कि आम आदमी पार्टी के बढ़ते दायरे को यदि कुछ ब्रेक लगा सकता है तो वो उसका यही फैसला है।

पंजाब के दलितों में भी कई गुटों का है अलग-अलग प्रभाव

पंजाब के दलितों में भी कई गुटों का है अलग-अलग प्रभाव

लेकिन, पंजाब में दलितों की राजनीति इतनी सुलझी हुई भी नहीं है। इस समाज में भी कई तरह का विभाजन है और हर समुदाय एकजुट होकर वोट करेगा, इसकी संभावना होने का अभी कोई कारण नहीं दिख रहा है। पंजाब में दलित समाज मुख्य रूप से चार समूहों में बंटे हुए हैं। मजहबी, रामदसिया/रविदसिया, अद-धर्मी और बाल्मीकि। इन चारों की आबादी राज्य की अनुसूचित जाति की जनसंख्या का 80% है। सबसे बड़ा समाज मजहबी सिखों का है, जो दलितों की जनसंख्या के करीब एक-तिहाई यानी 32% हैं। इसके बाद रामदसिया, रामदसिया सिख, रविदसिया और रविदसिया सिखों की जनसंख्या है, जिनकी आबादी 26% है। कांग्रेस के नेता और मुख्यमंत्री चन्नी रामदसिया हैं। लेकिन, वे मजहबी सिखों में भी वही प्रभाव डाल पाएंगे, इसके बारे में कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता। आमतौर पर पंजाब में मजहबी सिखों का वोट कांग्रेस या अकालियों को मिलता रहा है।

अकाली-बसपा गठबंधन को नजरअंदाज करना भूल!

अकाली-बसपा गठबंधन को नजरअंदाज करना भूल!

117 सीटों वाली पंजाब विधानसभा में 34 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं। 2017 के चुनाव में इनमें से 21 कांग्रेस के खाते में गई थी। आम आदमी पार्टी 9 सीटें जीती थी। और तब अकाली-बीजेपी गठबंधन 4 सीटें ले पाई थी। लेकिन, ठीक पांच साल पहले यानी 2012 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह से उलटी हुई थी। तब अकाली दल ने 21 और उसकी सहयोगी बीजेपी ने 3 सीटें जीत ली थी और कांग्रेस महज 10 ही सीट ले पाई थी। इसबार बीजेपी की जगह शिरोमणि अकाली दल ने कांशीराम और मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी के साथ गठबंध किया है और यह कांग्रेस का रास्ता इतना आसान नहीं बनने देंगे। पंजाब में जन्मे बसपा के संस्थापक भी चन्नी की तरह ही रामदसिया थे। बसपा ने पंजाब के चुनाव में अगर कभी सबसे धमाकेदार कामयाबी पाई है तो वह अकाली दल के साथ 1996 के लोकसभा चुनावों में ही पाई है और इसलिए इस गठबंधन को नजरअंदाज करना बहुत बड़ी भूल हो सकती है।

1996 में अकाली-बसपा का प्रदर्शन शानदार था

1996 में अकाली-बसपा का प्रदर्शन शानदार था

1996 के लोकसभा चुनावों का इतिहास देखें तो पंजाब की 13 सीटों में से गुरदासपुर और अमृतसर छोड़कर बाकी सारी सीटें अकाली-बसपा गठबंधन के खाते में चली गई थी। 8 सीटों पर अकाली और 3 सीटों पर बीएसपी के सांसद जीते थे। 13 में से 3 आरक्षित सीटों में से 2 पर शिरोमणि अकाली दल और एक पर बसपा का कब्जा हुआ था। कांग्रेस एक भी सुरक्षित सीट नहीं जीत पाई थी। पंजाब में उस चुनाव में बीएसपी को 9.35% वोट मिले थे। जबकि, अकाली दल को 28.72% वोट मिला था। वहीं, कांग्रेस को 35.1% वोट मिले थे।

चन्नी का रास्ता क्यों नहीं है आसान ?

चन्नी का रास्ता क्यों नहीं है आसान ?

पंजाब में दलित राजनीति को समझने वाले जानकारों का मानना रहा है कि वहां ये किसी भी एक पार्टी के साथ बंधकर नहीं रहते। न्यू इंडियन एक्सप्रेस पोर्टल ने एक ऐसे ही एक्सपर्ट के हवाले से बताया था कि, 'पंजाब में हिंदू या फिर सिख दलित किसी भी एक दल को वोट नहीं देते। जिससे वे पहले से जुड़े रहते हैं, उन्हीं का समर्थन करते हैं। सियासी दबदबे के लिए भी इनमें आपसी संघर्ष रहता है।' जाहिर है कि इससे कांग्रेस के लिए दलित वोट बैंक की परिस्थितियां उतनी स्पष्ट नहीं लग रही हैं, जितना की दावा किया जा रहा है।

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