पंजाब सीएम कैप्टन अमरिंदर की तरफ से प्रायोजित था गन्ना किसानों का आंदोलन, किसान नेता विकल पचार का आरोप
हरियाणा के किसान नेता विकल पचार ने कहा कि गन्ना किसानों का आंदोलन प्रायोजित था। जुलाई 2020 में जब गन्ने की मूल्य को लेकर आंदोलन शुरू किया गया था उस वक्त भी गन्ना ख़रीदी मूल्य 325 रुपये प्रति क्विंटल ही था।
चंडीगढ़, अगस्त 27, 2021 । गन्ना किसानों ने कुछ दिन पहले गन्ने की ख़रीदी मूल्य को लेकर आंदोलन किया था। उन्होंने कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ बैठक कर 360 रुपये प्रति क्विंटल के मुल्य पर सहमती बना कर गन्ना किसानों ने आंदोलन को ख़त्म कर दिया था। वही हरियाणा के किसान नेता विकल पचार ने गन्ना किसान आंदोलन को प्रायोजित बताते हुए कहा कि कैप्यन अमरिंदर सिंह ने राजनीतिक फ़ायदे के लिए आंदोलन करवाया था। उन्होंने कहा कि मेरे पास गन्ना किसानों का आंदोलन प्रायोजित था इसके सारे सबूत हैं।

पंजाब से दिल्ली की ओर किया आंदोलन का रुख़
हरियाणा के किसान नेता विकल पचार ने कहा कि गन्ना किसानों का आंदोलन प्रायोजित था। जुलाई 2020 में जब गन्ने की मूल्य को लेकर आंदोलन शुरू किया गया था उस वक्त भी गन्ना ख़रीदी मूल्य 325 रुपये प्रति क्विंटल ही था। उससे पांच साल पहले भी मूल्य ज़्यादा ही था, हरियाणा में पंजाब के मुक़ाबले गन्ना ख़रीदी मूल्य हमेशा से ज्यादा रहा है। लेकिन पंजाब के गन्ना किसानों ने कभी भी गन्ना ख़रीदी मूल्य को लेकर आंदोलन नहीं किया। गन्ना किसान पंजाब तक ही आंदोलन को सीमित रखना चाहते थे, हरियाणा के किसानों ने ही बैरिकेड हटाकर आंदोलन को दिल्ली तक लेकर गए।
चुनावी फ़ायदे के लिए हुआ गन्ना किसानों का आंदोलन
विकल पचार ने कहा कि किसान आंदोलन के हरियाणा में भी जल भराव हुआ, फ़सलें ख़राब हुईं हम लोगों पर भी फ़सलों के मुआवज़े के लिए आंदोलन का दबाव था लेकिन हरियाणा के किसान दिल्ली में हो रहे आंदोलन में बाधा नहीं डालना चाहते थे इसलिए आंदोलन नहीं किया।
अमरिंदर सिंह पहले ही गन्ना ख़रीदी मूल्य में इज़ाफ़ा करने वाले थे लेकिन पंजाब चुनाव के ठीक पहले चुनावी फ़ायदा लेने के लिए उन्होंने गन्ना किसानों का आंदोलन करवाया।
ग़ौरतलब है कि पंजाब की तर्ज़ पर इतना बड़ा किसान आंदोलन किया जा रहा है इसमें 40 में से 32 नेता पंजाब के थे। जो कि दिल्ली छोड़कर ख़ास तौर से पंजाब में सात दिनों के लिए आंदोलन करने गए।
'आंदोलनकारियों को कांग्रेस की फंडिंग'
किसान नेता विकल पचार ने कहा
जो 32 लोग पंजाब गन्ना किसानों के आंदोलन में शामिल थे उन सभी आंदोलनकारियों को कांग्रेस द्वारा फंडिंग की गई थी। इसलिए ही वह सभी लोग दिल्ली छोड़कर पंजाब में आंदोलन करने गए थे। हम लोगों ने कहा था कि किसानों की लड़ाई काले क़ानून को लेकर नरेन्द्र मोदी से है दिल्ली के आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहिए। संसद का घेराव करना चाहिए, प्रधानमंत्री आवास का घेराव करना चाहिए लेकिन उन सभी लोगों ने हम लोगों की बात नहीं सुनी। उन्होंने बैकफुट पर जाकर पंजाब में सात दिनों के लिए आंदोलन किया। उन सात दिनों के दौरान मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से दो बार मुलाक़ात भी की, उन्होंने पहली बैठक को कामयाब नहीं बताया। दूसरी बैठक में सभी लोग पहले से ही मिठाई का डिब्बा लेकर गए जैसे उन्हें पता था कि आज सहतमी दर्ज होगी ।
मिठाई का डिब्बा ले जाने का मतलब यह था कि जो मीटिंग होने वाली है उसमें अमरिंदर सिंह सहमती दर्ज करेंगे और ये लोग उन्हें मिठाई खिलाकर जयकारे के लगाएंगे।
प्रायोजित आंदोलन का आरोप ग़लत
इसी बाबत वन इंडिया हिन्दी ने किसान नेता परमिंदर संधु से बात की उन्होंने किसान नेता विकाल पचार के आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया।
परमिंदर संधु ने कहा कि पंजाब सरकार कई वर्षों से गन्ने का कम दाम दे रही थी। इसलिए किसानों ने आंदोलन किया ताकि सरकार उनके मसले हल करे। गन्ना किसानों की मांग थी की 400 रुपये प्रति क्विंटल का मुल्य दिया जाए। 360 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से सरकार और गन्ना किसानों की सहमती हुए और आंदोलन को ख़त्म किया गया।
इसमें प्रायोजित आंदोलन वाली कोई बात नहीं है यह सिर्फ़ अफवाह है। गन्ना किसानों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने सरकार के साथ बैठक कर सहमती दर्ज की है।
'किसान भाजपा और कांग्रेस दोनों के ख़िलाफ़ हैं'
जाट महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी वीरपाल सिंह ने भी इस बाबत वन इंडिया हिन्दी से बात की और हरियाणा किसान नेता के द्वारा लगाए गए आरोपों को ग़लत बताया। उन्होंने कहा कि
कैप्टन अमरिंदर सिंह के कहने पर किसान आंदोलन करेंगे और उनके कहने पर आंदोलन ख़त्म करेंगे। आज के किसान पढ़े लिखे हैं और उन्हें अच्छे बुरे की समझ है।उन्होंने कहा कि किसान जितना भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ हैं उतना ही कांग्रेस पार्टी के भी ख़िलाफ़ हैं। आंदोलन किसी के कहने से शुरू या बंद नहीं किया जाता है जब दोनों पक्ष की सहमती होती है तब जाकर आंदोलन ख़त्म होता है।
अभी किसान केन्द्र के कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे हैं तो क्या ये प्रायोजित आंदोलन है।
'पूरे देश के किसानों के लिए हो रहा है आंदोलन'
चौधरी वीरपाल सिंह ने कहा कि किसान अभी केन्द्र सरकार के ख़िलाफ़ MSP की गारंटी, कृषि कानूनों की वापसी के लिए आंदोलन कर रहे हैं। किसी एक राज्य के किसानों के लिए आंदोलन नहीं है बल्की पूरे देश के किसानों के हित के लिए आंदोलन किया जा रहा है। केन्द्र सरकार ने गन्ना किसानों के लिए 7 साल में सिर्फ़ 5 रुपये प्रति क्विंटल मूल्य बढाया ये तो ऐसा है जैसे 'ऊंट के मुंह में ज़ीरा' । डीज़ल के दाम आसमान छू रहे हैं ऐसे में किसान 5 रुपये बढ़ाने से कैसे भरपाई करेगा।
'कांग्रेस भी लाना चाहती था काला कृषि क़ानून'
केन्द्र में जब कांग्रेस की सरकार थी तो वह भी तीन कृषि क़ानून लाना चाहती थी लेकिन कांग्रेस की बड़े उद्योगपति जैसे अडानी, अंबानी के साथ डील नहीं हो पाई। भारतीय जनता पार्टी भी पहले टर्म में भी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई थी लेकिन उसे भी 7 साल लग गए उद्योगपतियों के साथ डील करने में नहीं तो भाजपा चाहती तो सरकार के आते ही कृषि क़ानून पारित कर देती। ये दोनों पार्टी किसान वरोधी है, किसान हितैषी है। भाजपा चाहती है कि किसान उद्योगपतियों के कहने पर काम करे और किसान मज़दूर कि हैसियत में आ जाएं। सरकार ने उन्हें रास्ता देने के लिए ये काले कृषि क़ानून बनाए हैं।












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