पंजाब चुनाव: किसान आंदोलन के बाद ऐसा क्या हो रहा है, जिसको लेकर उठ रहे हैं सवाल ?

चंडीगढ़, 19 दिसंबर: किसान आंदोलन की समाप्ति के बाद लग रहा था कि सबकुछ शांत हो जाएगा। दिल्ली की सीमाओं पर तो उम्मीद के मुताबिक शांति वापस लौट चुकी है और एक साल से ज्यादा वक्त से धरने पर बैठे आंदोलनकारी किसान अपने घरों को वापस लौट चुके हैं। लेकिन, पंजाब में किसान आंदोलन का आफ्टर इफेक्ट नजर आने लगा है। किसान संगठनों के नेता अब किसानों से अलग मुद्दों पर भी अपनी टांग घुसा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि चुनाव से पहले पंजाब में जो हालात पैदा होते जा रहे हैं, वह क्या दुश्मन पड़ोसी की सीमा से सटे राज्य के लिए सही है?

अभी आंदोलन के ही मूड में हैं आंदोलनकारी किसान

अभी आंदोलन के ही मूड में हैं आंदोलनकारी किसान

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ एक साल से ज्यादा लंबा चला किसान आंदोलन तो खत्म हो चुका है, लेकिन अब इसके बाद पंजाब की राजनीति में उथल-पुथल मच रहा है। अगले साल फरवरी-मार्च में पंजाब विधानसभा चुनाव होने की संभावना है और दिल्ली की सीमाओं से लौटे आंदोलनकारी किसानों का कम से कम पंजाब में तो जोश कुछ ज्यादा ही हाई है। दूसरी तरफ प्रदेश की चुनावी राजनीति इसबार जिस कदर चार हिस्सों में विभाजित हो चुकी है, वैसा यहां कभी देखने को नहीं मिला है। नतीजा चुनाव पूर्व अनुमानों में त्रिशंकु विधानसभा के आसार बताए जा रहे हैं, जो कि पंजाब के लोगों में राजनीतिक अनिश्चितता का भय जगा रहे हैं। क्योंकि पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है और यह लंबे समय तक आतंकवाद और अलगाववादी हिंसा भी झेल चुका है।

किसानों से अलग मुद्दों पर भी प्रदर्शन कर रहे

किसानों से अलग मुद्दों पर भी प्रदर्शन कर रहे

पिछले कुछ हफ्तों में राज्य में दिल्ली की सीमाओं से वापस लौटे अति-उत्साहित किसान आंदोलनकारी जिस अंदाज में पंजाब में अपनी ताकत का अहसास कराने की कोशिश कर रहे हैं, उससे लगता है कि वह अभी भी आंदोलन के मूड में हैं; और यह प्रदेश की शांति को लेकर सही नहीं लग रहा है। इससे प्रदेश के कई हिस्सों में माहौल बिगड़ने का डर सताने लगा है। एक वरिष्ठ नेता ने एक अखबार से कहा है, 'मोदी सरकार से अलोकप्रिय कृषि कानूनों को वापस करवाकर उन्हें (किसानों को) बहुत बड़ी जीत मिली है। लेकिन, इसका एक परेशान करने वाला नतीजा सामने आ रहा है। उन्होंने खून का स्वाद चख लिया है और अब वे पंजाब में उन मुद्दों पर भी अपनी आवाज उठाना चाहते हैं जो उनसे (किसानों) से संबंधित नहीं हैं। '

सरकार विरोधी हर प्रदर्शन में किसान संगठन!

सरकार विरोधी हर प्रदर्शन में किसान संगठन!

पिछले कुछ दिनों में पंजाब के कई इलाकों में किसान यूनियन के नेताओं ने कई मसलों पर विरोध प्रदर्शन किए हैं और जाम लगाए हैं। उदाहण के लिए प्रदर्शनकारी किसानों ने कई टोल रोड को इसलिए बंद कर दिया, क्योंकि वह हाल में बढ़ाए गए टोल टैक्स को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। मालवा इलाके में यह प्रदर्शन भारतीय किसान यूनियन के नेता जोगिंदर सिंह उग्राहन ने शुरू किया और पंजाब के कई इलाकों तक पहुंच गया, जिससे ट्रैफिक अस्त-व्यस्त होने लगी। अमृतसर के एक कारोबारी ने कहा कि अमृतसर से पहले प्रदर्शनकारियों ने जाम लगा दिया था, जिसकी वजह से उसे वापस जाकर दूसरे रास्ते से आना पड़ा, जिसमें डेढ़ घंटे से ज्यादा लग गए। किसान संगठनों ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के कर्मचारियों की नौकरियां पक्की करने की मांग को लेकर हो रहे आंदोलन का भी समर्थन कर दिया है। इन्हें कोविड के समय प्रसव में सहयोग के लिए अस्थाई तौर पर रखा गया था, लेकिन अब वे सरकारी कर्मचारी के तौर पर स्थाई बहाली चाहते हैं। हाल में किसान संगठनों ने इनकी मांग के समर्थन में मोहाली से चंडीगढ़ एयरपोर्ट जाने वाली सड़क को ही जाम कर दिया।

शहरों में पैदा हो रहा है तनाव का माहौल!

शहरों में पैदा हो रहा है तनाव का माहौल!

किसान संगठनों के इस नए अवतार से पंजाब के शहरी वोटरों की चिंता बढ़नी स्वाभाविक है। क्योंकि पंजाब के शहरी वोटरों में ज्यादातर छोटे कारोबारी, व्यापारी और उद्योगपति हैं। जिस तरह से हाल में माहौल बनना शुरू हुआ है, उससे आए दिन सड़कों पर आंदोलनों-प्रदर्शनों की स्थिति पैदा होने की चिंता है। किसान आंदोलन में जीत चुके किसान आंदोलनकारियों का एक गुट तो राजनीतिक दल बनाने की घोषणा भी कर चुका है। जानकारों की राय में अगर पंजाब में शहरी और ग्रामीण वोटरों के बीच किसी वजह से गतिरोध पैदा हुआ तो यह प्रदेश की सेहत के लिए सही नहीं होगा, खासकर तब जब प्रदेश में चार गठबंधनों या दलों- कांग्रेस, अकाली दल-बसपा गठबंधन, आम आदमी पार्टी और बीजेपी- अमरिंदर सिंह और सुखदेव सिंह ढींढसा की पार्टियों के गठबंधन में मुकाबले की वजह से त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणी की जा रही है। (तस्वीरें- प्रतीकात्मक)

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