Flashback 2021: पंजाब कांग्रेस में क्यों पड़ी दरार, कलह की किस तरह से हुई शुरुआत ?
पंजाब में जब सभी सियासी दल विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे थे। तो पंजाब कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर अलग ही घमासान छिड़ा हुआ था।
चंडीगढ़, 25 दिसंबर, 2021। पंजाब में जब सभी सियासी दल विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे थे। तो पंजाब कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर अलग ही घमासान छिड़ा हुआ था। पंजाब कांग्रेस में कैप्टन और अमरिंदर सिंह का विवाद इतना बढ़ गया था कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पंजाब कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया और अपनी नई सियासी पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस पार्टी बना ली। वहीं पंजाब कांग्रेस के चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री बनाने के बाद यह लग रहा था कि कांग्रेस पार्टी में विवादों का सिलसिला ख़त्म हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू कभी एजी की नियुक्ति तो कभी डीजीपी की नियुक्ति तो कभी किसी मुद्दे पर अपने ही सरकार को घेरते हुए नज़र आ जाते हैं। इसका नतीजा यह रहा कि कांग्रेस अब बिना मुख्यमंत्री के चेहरे के ही पंजाब विधानसभा चुनाव लड़ेगी। आइए जानते हैं कि पंजाब कांग्रेस में क्यों पड़ी दरार और कलह की किस तरह से हुई शुरुआत ?

कैप्टन ने कही थी अंतिम चुनाव है
पूर्व पंजाब प्रभारी और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के सिद्धू के चेहरे पर चुनाव में जाने की बात का विरोध सुनील जाखड ने ट्वीट के ज़रिए किया था। इन सब बातों को देखने के बाद यह बात साफ़ हो थी कि कांग्रेस के कथनी और करनी में कोई ताल मेल नहीं है, जो कुछ भी हो रहा है अपने आप चल रहा है। पंजाब कांग्रेस में जो कुछ भी हुआ अचानक से हुआ घटनाक्रम नहीं है बल्कि एक निश्चित प्लान के तहत की गई कार्यवाही का नतीजा है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के हटाए जानें की प्रक्रिया के बीज सिद्धू के कांग्रेस में शामिल होने के साथ ही पड़ गए थे। वर्तमान पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू पिछले चुनाव में इसी शर्त पर कांग्रेस में आये थे कि अगली बार पार्टी उन्हें अहम जिम्मेदारी देगी। वहीं नवजोत सिंह सिद्धू के कांग्रेस में शामिल होने के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने यह बात सार्वजनिक तौर पर कही थी कि यह उनका अंतिम चुनाव है।

सिद्धू ने किया कांग्रेस की तरफ़ रुख
नवजोत सिंह सिद्धू को कांग्रेस में लानें के लिए प्रशांत किशोर की टीम नें फील्डिंग लगाई और आम आदमी पार्टी की तरफ़ जा रहे सिद्धू को कांग्रेस पार्टी की सदस्यता दिलाई। वहीं पीके की टीम ने कैप्टन की छवि को सुधारने के लिए उन्हें ज़मीन पर उतारा पार्टी के अन्दर के लोगों से व्यक्तित्व के रूप में कैप्टन की छवी दिन पर दिन सबसे मज़बूत होती गई। आख़िरकार 2 सालों से जमीन और पार्टी की माथापच्ची से पार पाते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री बने। नवजोत सिंह सिद्धू को मंत्री तो बनाया गया लेकिन ताल मेल नहीं बन सका। लोकसभा चुनाव में भी सिद्धू की नहीं चली कैप्टन के नेतृत्व में पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन भी किया और यह साबित किया कि पंजाब में कैप्टन के इतना मज़बूत कोई दूसरा नेता नहीं है। पूरे देश में हारने वाली कांग्रेस को पंजाब की 12 सीटों में से 8 सीटें मिलीं।

मज़बूत नेता के तौर पर स्थापित हुए कैप्टन
इसी दरम्यान आम आदमी पार्टी के कई विधायकों ने कांग्रेस का दामन थामा। दोबारा कांग्रेस से उपचुनाव में जीत कर भी आये, नतीजतन कांग्रेस की सीटें 77 से 80 हों गई। इन सारे प्रकरणों में कैप्टन बड़े ही मज़बूत नेता के तौर पर स्थापित हुए। यहां तक माना जाने लगा कि कैप्टन को हटा दो तो कांग्रेस का पंजाब में कोई अस्तित्व नहीं। इसी बीच सिद्धू को मंत्री पद से भी हटा दिया गया। वहीं नवजोत सिंह सिद्धू भी कैप्टन को मात देनें में कोई कसर नहीं छोड़ते हुए खुद को कैप्टन का उत्तराधिकारी साबित करने की हर कोशिशें करते रहे। अगर ऐसा नहीं कर पाते तो कैप्टन की कमज़ोरियों को एक विपक्षी नेता के रूप में उठा देते। उदाहरण के तौर करतारपुर कॉरीडोर खोलने का पूरा श्रेय भी लिए और जनता के बीच यह मैसेज पहुंचाने में भी कामयाब रहे कि यह कार्य इनके द्वारा किया गया है। साथ ही अकाली दल और आम आदमी पार्टी को हर फ्रंट पर कमज़ोर देख ख़ुद बेअदबी के मुद्दे को उठाते रहे।

दिल्ली दरबार से दूरी थी कैप्टन की कमजोरी
कैप्टन अमरिंदर सिंह की जो सबसे बड़ी कमजोरी थी दिल्ली दरबार से दूरी थी। नवजोत सिंह सिद्धू ने कैप्टन की इस कमज़ोरी का फ़ायदा उठाने के लिए प्लान तैयार किया और हर मौके पर पंजाब की बातों को दिल्ली पहुंचाते रहे। पंजाब में कैप्टन को न घेर पाने वाले सिद्धू नें कैप्टन को दिल्ली से घेरना शुरू किया। इसमें उन्होंने प्रियंका गांधी को अपने पक्ष में किया। चूंकी सिद्धू के ज्वाइनिंग में प्रियंका गांधी की अहम् भूमिका रही थी इसलिए प्रियंका गांधी प्रत्यक्ष रूप से सिद्धू की मदद करती रहीं। उधर नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी से भी मिलते रहे और अध्यक्ष बनते वक़्त सोनिया गांधी को भी बिश्वास में लिया। वहीं कैप्टन का दिल्ली दरबार से संपर्क न के बराबर रहा।

आलाकमान का उठ गया कैप्टन से भरोसा
दिल्ली दरबार ने कैप्टन को अमृतसर भेजकर बीजेपी को 2014 में बीजेपी के दिग्गज नेता अरुण जेटली को हरा दिया वह नेता कैसे सिद्धू से हार सकता था। सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी ने कैप्टन को अमृतसर की जंग जीतने के लिए अमृतसर से रण में उतरने का निवेदन किया और कांग्रेस ने अमृतसर सीट मांगी। कैप्टन ने अपनी रणनीति से जेटली को 1 लाख वोट से हराकर यह सीट कांग्रेस की झोली में डाल दी थी। लेकिन जितनी बार सोनिया से दिल्ली में मिले उतनी बार मोदी से भी मिलने वाले कैप्टन ने जब 37 0 के मुद्दे पर कांग्रेस से इतर बयान दिया तो कांग्रेस आलाकमान का कैप्टन से विश्वास घटता गया । इतना ही नहीं कैप्टकन अमरिंदर सिंह ने जम्मू -कश्मीनर से अनुच्छेसद 370 हटाने के बाद चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉटफ की नियुक्ति का भी समर्थन किया था। उन्हों ने कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) का पद सृजन करने का ऐलान सराहनीय है। यह देश की रक्षा सेनाओं के कमांड ढांचे को मज़बूत बनाने वाला अहम कदम है।

कैप्टन ने बनाई अपनी सियासी पार्टी
18 जुलाई 2021 को कैप्टन के विरोध के बाद भी सिद्धू को कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। कैप्टन इसी दिन कांग्रेस छोड़ देते या विधायकों को तोड़कर अपनी सरकार बना लेते तो अच्छा होता। इसके बाद 5 अगस्त को कैप्टन के मुख्य सलाहकार के पद से प्रशांत किशोर ने भी इस्तीफा दिया फिर भी कैप्टन दिल्ली दरबार की तिकड़म बाजी को नहीं समझ सके या अन्दर खाने विधायकों को जोड़ने की कोशिश नहीं की। लेकिन तब तक गाड़ी प्लेट फॉर्म से आगे जा चुकी थी। अब पंजाब के विधायकों की मीटिंग भी दिल्ली में होने लगी थी जिसमे कांग्रेस कैप्टन को विश्वास में भी नहीं लेती थी। इसी सब वजह से कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा देते हुए अपनी सियासी पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस का गठन कर लिया। कैप्टन की सियासी पार्टी पंजाब कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव में चुनौती बनी हुई है।
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