Opposition Party Meeting: क्या कांग्रेस को धमकी देकर होगी विपक्ष की महाएकता ?
क्या कांग्रेस को धमकी दे कर होगी विपक्ष की एकता ? केजरीवाल सरकार ने अध्यादेश के मुद्दे पर न केवल कांग्रेस को धमकी दी है बल्कि पटना महासम्मेलन के बहिष्कार करने तक की भी बात कह दी है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने पहले ही कांग्रेस को लेकर आपत्ति जाहिर की थी। अब ये नया विवाद खड़ा हो गया है। क्या इस विवाद से नीतीश कुमार की मेहनत पर पानी फिरने वाला है? कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि पटना में विपक्षी नेताओं की बैठक का बड़ा एजेंडा भाजपा को हराना है। अध्यादेश का मुद्दा इससे बड़ा नहीं है। इस पर बैठक में चर्चा हो सकती है। लेकिन चर्चा का यह पहला मुद्दा नहीं हो सकता।
संसद में कोई 0 तो कोई 1, क्या ये बनाएंगे विकल्प
क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक हितों की बलि चढ़ा कर विपक्षी एकता के लिए तैयार होगी ? क्या विपक्ष में सबसे मजबूर दल वही है ? फिर बार बार उसके सिर पर शर्तें क्यों थोपी जाती हैं ? आज भी कांग्रेस लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। उसकी उपेक्षा का मतलब है विपक्षी एकता की मुहिम में पलीता लगाना। 1996 में और 1997 में जनता दल के एचडी देवेगौड़ और इंद्र कुमार गुजराल इसलिए प्रधानमंत्री बन गये थे क्यों कि कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था। अभी विपक्ष में जितने भी दल हैं अगर इनमें से कांग्रेस को हटा दिया जाय तो इनका आंकड़ा सौ तक भी नहीं पहुंच पाएगा। अगर कांग्रेस इस खींचतान के कारण एकता की मुहिम से अलग हो गयी तो क्या तृणमूल, द्रमुक, जदयू, राजद मिल कर सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच जाएंगे ? कहने के लिए 18 दलों का जुटान हो रहा है लेकिन
इनमें से अधिकतर दलों की चुनावी ताकत बहुत कम है। राजद का लोकसभा में कोई सदस्य नहीं है। आप का लोकसभा में केवल एक सदस्य है। हेमंत सोरेन की पार्टी (झामुमो) के केवल एक सांसद हैं। माकपा के 3 तो भाकपा के 2 सांसद हैं।

'एक के खिलाफ एक’ नीति को लागू करना कठिन
कहा जा रहा है कि इस बैठक में इस बात पर सहमति बनाने की कोशिश होगी कि भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ विपक्ष का कोई एक उम्मीदवार ही उतारा जाय। अगर ऐसा हुआ तो यकीकन भाजपा को हराया जा सकता है। जैसे 2018 में गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में
विपक्ष ने सम्मिलिति रूप केवल एक उम्मीदवार उतारा था जिससे भाजपा की उसके गढ़ में हार हो गयी थी। लेकिन राजनीति का यह महाप्रयोग जल्द ही मिट्टी में मिल गया। मायावती और अखिलेश यादव की राहें अलग हो गयी। 2019 में दोनों अलग अलग लड़े और भाजपा बाजी मार ले गयी। क्या 2024 में 'भाजपा के खिलाफ विपक्ष का केवल एक उम्मीदवार’ का फार्मूला लागू हो पाएगा। जब बैठक के पहले ही सौदेबाजी का खेल शुरू है तो फिर इतनी बड़ी कुर्बानी की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? जब 'एक के खिलाफ एक’ नीति लागू होगी तब कई दलों को अपने हितों से समझौता करना होगा। क्या वे कर पाएंगे ?
क्षेत्रीय दल कांग्रेस के भरोसे क्यों नहीं रहना चाहते ?
तीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान पटना पहुंच चुके हैं। अब कांग्रेस पर निर्भर है कि वह आप की शर्त पर क्या रूख अपनाती है। सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। कांग्रेस अपने फायदे के लिए गैऱभाजपा सरकार बनवाती रही है और गिराती रही है। कांग्रेस ने अपने फायदे के लिए ही 1979 में चरण सिंह की सरकार बनवायी थी ताकि जनता पार्टी टूट फूट कर बर्बाद हो जाए। मकसद पूरा हो गया तो चरण सिंह को किनारे लगा दिया। 1990 में चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनाना भी कांग्रेस का गेम प्लान ही था। कांग्रेस ने वीपी सिंह की सरकार गिराने के लिए चंद्रशेखर को आगे कर दिया था ताकि वह अपना पुराना हिसाब बराबर कर सके। फिर चंद्रशेखर को भी रुखसत कर दिया।
क्या कांग्रेस क्षेत्रीय दलों से लॉन्ग टर्म दोस्ती करेगी ?
इसी तरह कांग्रेस ने 1996 में देवेगौड़ और 1997 में इंद्र कुमार गुजराल की सरकार बनवायी और फिर इस आस में सरकार गिरा दी कि 1998 के मध्यावधि चुनाव में उसे विजय मिल जाएगी। कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है। वह अकेले सत्ता की अभ्यस्त रही है। इसलिए वह क्षेत्रीय दलों के साथ लॉन्ग टर्म दोस्ती नहीं कर सकती। वह गैरभाजपा सरकार इस लिए बनवाती है ताकि मौका देख कर उसे गिरा दे।
इसलिए कांग्रेस को लेकर भी क्षेत्रीय दलों में एक हिचक रही। इसलिए विपक्षी एकता के लिए सभी दलों को ईमानदारी से कदम बढ़ाने होंगे।












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