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उत्तराखंड में भी बढ़ती जा रही है दागी नेताओं की समस्या

फाइल तस्वीर

नई दिल्ली, 08 फरवरी। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को पार्टियों द्वारा चुनावों में टिकट देने के चलन से उत्तराखंड भी अछूता नहीं है. इस बार चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों में से कम से कम 107 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं.

ये आंकड़े चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने इन उम्मीदवारों द्वारा दायर किए उन्हीं के चुनावी हलफनामों से निकाले हैं. कुल 632 में से 626 उम्मीदवारों के हलफनामों की समीक्षा की गई है. छह हलफनामे चुनाव आयोग की वेबसाइट पर ठीक से अपलोड नहीं किए गए.

(पढ़ें: सांसदों, विधायकों के खिलाफ लंबित हैं करीब 5,000 आपराधिक मामले)

गंभीर आपराधिक मामले

इन 626 उम्मीदवारों में से 17 प्रतिशत (107) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की जानकारी चुनाव आयोग को दी है. 2017 में राज्य विधानसभा चुनावों में आपराधिक मामलों का सामना कर रहे उम्मीदवार 14 प्रतिशत (91) थे. यानी इस तरह के उम्मीदवारों की संख्या तीन प्रतिशत बढ़ गई है.

आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों में से ही जनता कैसे अपना प्रतिनिधि चुने

इस साल 626 उम्मीदवारों में से 10 प्रतिशत (61) उम्मीदवार ऐसे हैं जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं. 2017 में इस तरह के उम्मीदवारों की संख्या आठ प्रतिशत (54) थी. यानी गंभीर आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों की संख्या कम होने की जगह दो प्रतिशत बढ़ गई है.

इस तरह के मामलों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा, बलात्कार, हत्या की कोशिश और हत्या जैसे आरोपों के मामले शामिल हैं. ऐसे उम्मीदवार बीजेपी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बसपा और उत्तराखंड क्रांति दल समेत राज्य में चुनाव लड़ रही सभी बड़ी पार्टियों में शामिल हैं.

(पढ़ें: उत्तर प्रदेश चुनाव: 20 प्रतिशत उम्मीदवारों के खिलाफ दर्ज हैं गंभीर आपराधिक मामले)

कांग्रेस के 70 उम्मीदवारों में से 11 (16 प्रतिशत), बीजेपी के 70 उम्मीदवारों में से आठ (11 प्रतिशत), आम आदमी पार्टी के 69 उम्मीदवारों में से नौ (13 प्रतिशत), बसपा के 54 उम्मीदवारों में से छह (11 प्रतिशत) और उत्तराखंड क्रांति दल के 42 उम्मीदवारों में चार (10 प्रतिशत) इसी श्रेणी में हैं.

क्यों चुनती हैं पार्टियां

इनमें से छह उम्मीदवार ऐसे हैं जिनके खिलाफ महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज हैं. इनमें से एक के खिलाफ तो एक महिला के साथ बार बार बलात्कार करने का मामला दर्ज है.

मतदाता वोट देने तो पहुंच जाते हैं लेकिन पार्टियां उन्हें स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवार नहीं दे पा रही हैं

एक उम्मीदवार ऐसा भी है जिसके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज है. तीन उम्मीदवारों खिलाफ हत्या की कोशिश के मामले दर्ज हैं. इसके अलावा एडीआर ने 70 निर्वाचन क्षेत्रों में से करीब 20 प्रतिशत (13) को रेड अलर्ट निर्वाचन क्षेत्र घोषित किया गया है यानी ऐसे क्षेत्र जहां तीन या तीन से ज्यादा उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं.

(पढ़ें: बीजेपी विधायक की रद्द सदस्यता और राजनीति में अपराध)

टिकट देने में इन सभी पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया है. अदालत ने फरवरी 2020 में आदेश दिया था कि पार्टियां जहां भी आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों को टिकट देंगी वहां उन्हें बताना होगा कि इन लोगों को चुनने के क्या क्या कारण थे. उन्हें यह भी बताना चाहिए कि ऐसे लोगों को क्यों नहीं चुना गया जिनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं है.

पैसों का असर

उत्तराखंड में भी चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिए जाने में धन-संपत्ति का प्रभाव दिखाई देता है. 626 में से 252 (40 प्रतिशत) उम्मीदवार करोड़पति हैं, जबकि 2017 में 31 प्रतिशत उम्मीदवार ही करोड़पति थे. सभी उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 2.74 करोड़ रुपए है.

चुनावों में पैसों का असर भी बढ़ता जा रहा है

69 (11 प्रतिशत) उम्मीदवारों की संपत्ति पांच करोड़ से ज्यादा है, 98 (16 प्रतिशत) उम्मीदवारों की संपत्ति दो से पांच करोड़ के बीच है और 176 (28 प्रतिशत) उम्मीदवारों की संपत्ति 50 लाख से दो करोड़ रुपयों के बीच है.

कांग्रेस के टिकट पर लक्सर से चुनाव लड़ने वाले अंतरिक्ष सैनी सबसे अमीर उम्मीदवार हैं. उनकी कुल घोषित संपत्ति का मूल्य 123 करोड़ रुपए है. चौबट्टाखाल से चुनाव लड़ने वाले बीजेपी नेता सतपाल महाराज की घोषित संपत्ति 87 करोड़ रुपए है. पौढ़ी गढ़वाल के श्रीनगर से चुनाव लड़ रहे उत्तराखंड क्रांति दल के मोहन काला की संपत्ति 82 करोड़ रुपए है.

Source: DW

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