क्या कांग्रेस सपा-बसपा गठबंधन से बाहर होने के बाद 2019 में 2009 का प्रदर्शन दोहरा पाएगी?
नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी को आगामी चुनाव में शिकस्त देने के लिए सारी विपक्षी पार्टियां एक साथ आ रही हैं। ये इसलिए हो रहा है ताकि चुनाव में हर कोई अपनी स्थिति मजबूत करके खुद के लिए जगह बनाए। इसलिए तब थोड़ा बहुत आश्चर्य होता है जब ये लड़ाई इनमें आपस में एक दूसरे के लिए बाधांए पैदा करती है. अब 1960 और 1980 की
तरह गठबंधन बनाने की कोशिश हो रही हैं, जैसा तब बीजेपी और जनता दल बनाते थे। अब अंतर ये है इनका रोल आज कांग्रेस पार्टी निभा रही है। आज कांग्रेस के वोट शेयर में कमी, भाजपा का उदय और क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व ने यूपी में इस लड़ाई को कड़ा बना दिया है। इसी वजह से यूपी में क्षेत्रीय पार्टियां साथ आ गई हैं और वो कांग्रेस को अन्य की तरह देख रही हैं।

कांग्रेस अकेले लड़ेगी चुनाव
कांग्रेस ने आने वाले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों पर लड़ने का फैसला किया है। इससे पहले कांग्रेस को उम्मीद थी कि भाजपा के खिलाफ सूबे में बन रहे गठबंधन में उसे भी शामिल किया जाएगा। कांग्रेस को महागठबंधन के ऐलान से पहले उम्मीद थी कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी उसे गठबंधन में ना सिर्फ शामिल करेगी बल्कि दो डिजिट में सीटें भी देगी। ऐसा ना होने के बाद जब कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है, तब से हर जगह इस बात पर चर्चा कर रहा है कि क्या कांग्रेस राहुल गांधी की अगुवाई में यूपी में साल 2019 में साल 2009 का प्रदर्शन दोहरा पाएगी। ऐसा नहीं होने की स्थिति में, कांग्रेस ने 30 मुश्किल सीटों पर उम्मीदवारों को स्थापित करने के विकल्प पर काम रही है , जहां उनके पक्ष में मिश्रित जनसांख्यिकीय गणित है।

बीएसपी-एसपी गठबंधन के खिलाफ सवर्ण आरक्षण
अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे और 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण के भरोसे भाजपा इन अगड़ी जातियों वाली सीटों पर नजर रखें हुए है और कड़ी मेहनत कर रही है। कांग्रेस के अकेले लड़ने पर कई विपक्षी गुटों का मानना है कि बीजेपी-बीएसपी-एसपी के खिलाफ एक अगड़ी जातियों के वोट इकठ्ठा करने में भाजपा की योजना में ये ये एक स्पैनर हो सकता है।

भाजपा को विधानसभा चुनाव में दी मात
कांग्रेस का मानना है कि गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की तरह 'किसान और नौजवान' नारे के साथ यूपी में भी बढ़िया प्रदर्शन कर सकती है। साल 2009 के लोकसभा चुनाव में हुए त्रिकोणीय मुकाबले में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 21 सीटें जीती थी। इस चुनाव में सपा को 23 और बसपा को 20 सीटें मिली थीं। वहीं तब भाजपा केवल 10 सीटें ही जीत पाई थी। उस समय कांग्रेस को 18.2 फीसदी वोट शेयर मिला था। पार्टी ने जिस तरह दिसंबर 2017 और उससे पहले 2016 में गुजरात में अपने प्रदर्शन से चौंकाया था। इस बार भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।












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