छठ पर सियासत करने वाले नहीं संभाल पाये दिल्ली का ट्रैफिक
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। आज राजधानी में पूर्वी दिल्ली से राजधानी के शेष भागों में आने -जाने वाले लाखों लोग आईटीओ, निजामउद्दीन और दूसरों पुलों पर छठ के कारण लगे जाम के कारण अपने दफ्तरों और दूसरी जगहों पर काफी देर से पहुंच रहे हैं। अगर बात आईटीओ पुल की करें तो यहां पर तमाम स्थानीय नेताओं ने अपने प्रचार करने के लिए बोर्ड लगवाए, पर कोई व्यवस्था नहीं पुलिस के साथ मिल कर ताकि ट्रैफिक सामान्य तरीके से चलता रहे।
मयूर विहार में रहने वाले अजय अऱोड़ा ने बताया कि उन्हें आईटीओ पुल को पार करने में करीब डेढ़ घंटा लगा। जबकि आमतौर पर आधा घंटा लगता है। इस बीच, पर्व छठ राजनीतिकरण भी जारी है। अफसोस कि मुंबई और दिल्ली समेत सभी जगहों पर छठ के नाम पर सियासत भी होने लगी है। जिस तरह से रमजान के दौरान रोजा-इफ्तार के नाम पर सियासत होती रही है, अब छट पर भी राजनीति होनी चालू हो गई है।
छठ पर राजनीति
अगर बात राजधानी दिल्ली की करें तो यहां देखते देखते छठ व्रतियों की संख्या हजारों में हो गई है। दिल्ली की सभी पार्टियों के स्थानीय नेता अपने मतदाताओं को लुभाने के लिए बड़े-बड़े होर्डिंग्स और बैनरों पर शुभकामना संदेश देने में जुट जाते हैं छट से पहले।
बीते दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा से लेकर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने पूर्वाचलियों को लुभाने के लिए छठ पर अवकाश देने का भी वादा कर लिया। वैसे ही देश में ढेर सारे सार्वजनिक अवकाश होते हैं। उस सूची में एक और अवकाश देने का वादा किया जाने लगा।
नेताओं की होड़
पूर्वांचल के लोगों कि बढ़ती ताकत का ही नतीजा है कि पुरबियों के सांस्कृतिक पर्व छठ में शरीक होने के लिए नेताओं की होड़ लगी रहती है। पुरबियों की तादाद देश के सभी शहरों में लगातार बढ़ी है और उसके साथ राजनीतिक भागीदारी में भी इजाफा हुआ है। यही कारण है कि सभी दल इस वोट बैंक को अपने लिए सुरक्षित रखना चाहते हैं।
बिहार से राज्यसभा सांसद आर.के. सिन्हा कहते हैं कि छठ बिहार और पूर्वाचल का पुरातन पर्व है। इसको लेकर राजनीति करना गलत है। छठ तो एक इस तरह का पर्व है,जिसमें जाति के बंधन टूटते हैं।
पर छठ पर सबसे ज्यादा राजनीति होती है मुंबई में। वहां भी छठ को लेकर बहुत जोर-शोर से तैयारी होती है। संजय निरूपम जब शिवसेना में हुआ करते थे, तब से ही वे वहां पर बिहार के लोगों को एक सूत्र में बांधने का काम करते रहे हैं। संजय निरूपम अगर लोकसभा तक पहुंचे हैं तो उसके पीछे उनका छट के नाम पर पुरबिया को उल्लू बनाना भी रहा।
राज ठाकरे भी मनाते हैं छठ
मुंबई में पुरबियों की बढ़ती ताकत को राज ठाकरे भी मानते हैं। उनको भी यह कहना पड़ा कि वह छठ पूजा के खिलाफ नहीं है बल्कि छठ के नाम पर जो राजनीति हो रही है उसके खिलाफ हैं। बहरहाल, लगता नहीं है कि छठ पर राजनीति फिलहाल थमने वाली है।













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