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लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस साथ आए, चुनाव आयोग के आपराधिक रिकॉर्ड पर विज्ञापन के बिल का किया विरोध

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा और कांग्रेस चुनाव आयोग के उस बिल के खिलाफ साथ आ गए हैं, जिसमें चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अपने आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी जनता के सामने सार्वजनिक करनी होगी। खासतौर पर तब जब ये विज्ञापन उम्मीदवारो के खर्च के लिए तय की गई सीमा के अंतर्गत आते हैं।

bjp and congress reached election commission on candidate footing bill for ads on criminal record

भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर चिंता व्यक्त की,जो उसने पिछले साल सितंबर में दिया था। इस फैसले से परिचित लोगों का कहना है कि चुनाव आयोग संचार के संबंध में इस फैसले को देखेगा और फिर निर्णय लेगा।

राजनीति मे राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि हर उम्मीदवार सावर्जनिक तौर पर मोटे अक्षरों में जनता को अपने आपराधिक रिकॉर्ड से अवगत कराएगा और इसके नामांकन दाखिल करने के बाद अखबारों और टेलीविजन में तीन बार इसके संबंध में विज्ञापन देगा।

चुनाव आयोग ने हाल ही में विधानसभा चुनाव में पहली बार इसे लागू किया था। उम्मीदवारों ने तय मानकों के अनुसार अपने आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी सामने रखी थी।

हालांकि चुनाव आयोग ने ये स्पष्ट नहीं किया है विज्ञापनों पर आने वाला ये खर्च कौन देगा और ये किसके खाते में जोड़ा जाएगा। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में इसे उम्मीदवारों के खर्च में जोड़ा गया।

अब भाजपा और कांग्रेस ने चुनाव आयोग को लिखकर कहा कि उम्मीदवार इस खर्च को सहन करने में असमर्थ हैं। चुनाव आयोग ने चुनाव में जो खर्च की जो सीमा तय कर रखी है उसमें विज्ञापन का खर्च जोड़ने से उन्हें चुनाव लड़ने में दिक्कतें आएंगी।

उन्होंने इस बिंदु पर ध्यान दिलाया कि शहरी इलाकों से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को ग्रामीण इलाकों से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की तुलना में अखबार और टीवी में विज्ञापन देने पर ज्यादा धन खर्च करना होगा, क्योंकि यहां विज्ञापन की कीमतें बहुत ज्यादा हैं।

सूत्रों ने कहा कि चुनाव आयोग ने पहले से ही हाल के चुनावों में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों से ऐसे सावर्जनिक खर्च के बारे में जानकारी मांगी है। इस संबंध में चुनाव आयोग का एक सुझाव है पार्टियों के लिए चुनाव लड़ने की कोई आय सीमा तय नहीं है। इसलिए इस खर्च को राजनीतिक दल के खाते में स्थानांतरित कर दिया जाए।

हालांकि, ये तर्क भी दिया जा रहा है कि पार्टी और उम्मीदवारों के लिए अपने आपराधिक रिकॉर्ड का विज्ञापन देने में आए खर्च को वहन करने के नियम को गलत तरीके से बनाया गया है. इससे बेहतर है कि एयरटाइम और अखबार में इसके लिए जगह आवंटित कर दी जाए, जैसा कि चुनाव प्रचार के लिए होता है।

अभी विधानसभा के उम्मीदवार के लिए खर्च की सीमा 28 लाख रुपये तय है, जबकि लोकसभा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए यह 70 लाख रुपये तय है। दिलचस्प बात यह है कि कई उम्मीदवार प्रचार खर्च के लिए भी इस सीमा को नहीं छू पाते हैं, जबकि हर साल चुनाव में नकदी और मुफ्त उपहारों में लगातार बढोतरी हो रही है।

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