मुंबई के मुसलमानों के कथित रहनुमाओं को चुनौती दे रहीं नूरजहां साफिया
नई दिल्ली (ब्यूरो)। मुंबई के मुसलमान का अपने को रहनुमा होने का दावा करने वाले मुसलमान इन दिनों नूरजहां साफिया नियाज के नाम से भी डरते हैं। दरअसल मुंबई की तारीखी हाजी अली दरगाह में बीते 600 सालों से औरतों को मर्दों के साथ भी नमाज पढ़ने की इजाजत थी। पर हाजी अली मैनेजमेंट से जुड़े लोगों ने फैसला सुनाया कि अब औरतें हाजी अली दरगाह के भीतर नमाज नहीं पढ़ सकेंगी। ये बात है साल साल 2012 की।
नहीं मिला जवाब
जब इस फैसले का विरोध नूरजहां ने किया तो मैनेजमेंट ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। मुंबई के विल्सन कालेज की छात्रा रहीं नूरजहां कहती हैं, उसने बताया कि हमारी संस्था मुस्लिम महिला आंदोलन ने मिनोरिटी कमीशन से लेकर दूसरे तमाम इदारों में अपनी बात रखी। पर जब बात नहीं बनी तो कोर्ट का दरवाजा खटखाया।
उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि हम दो स्तरों पर लड़ रहे हैं। पहला, औरतों की बराबरी का सवाल है। दूसरा, हाजी अली मैनेजममेंट का फैसला इस्लाम विरोधी है। इस्लाम मर्दों-औरतों में फर्क नहीं करता।
इतिहास के पन्नों से- मुंबई की माहिम दरगाह
बदला नियम
नूरजहां की तरफ से मुंबई की 19 प्रमुख दरगाहों का सर्वे भी किया गया ये जानने के लिए कि वहां पर क्या औरतें मर्दों के साथ नमाज नहीं पढ़ सकती हैं या नहीं। सर्वे से पता चला कि सिर्फ सात इस बात की अनुमति देती हैं। छह में तो शुरू से ही इस तरह का नियम था। पर हाजी अली ने अपनी रिवायत तो बदला। नूरजहां कहती हैं कि मक्का में जब मर्दों-औरतों को एक साथ नमाज पढ़ने की इजाजत है, तो भारत में क्यों नहीं। उनकी लड़ाई जारी है।













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