विश्लेषणः महाराष्ट्र चुनाव में जातिवाद-क्षेत्रवाद-धर्मवाद की आंधी!
भारतीय राजनीति में पिछड़े क्षेत्रों में होने वाले चुनाव भले ही जन समस्याओं को दूर करने वाले वादों पर लड़े जाते हों लेकिन पिछड़े क्षेत्रों में एक बड़ा वोट बैंक खींचने के लिए जातिवाद और क्षेत्रवाद का मुद्दा काफी हद तक एक बड़ी भूमिका निभाता है। लेकिन महाराष्ट्र जैसा राज्य जहां पर क्षेत्रीय मुद्दों के अलावा केंद्र में महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर लड़े गए हों वहां पर इस बार क्षेत्रवाद और जातिवाद का जाल बिछ रहा है।

शिवसेना के उद्धव ठाकरे लगातार भाजपा को गुजराती नेतृत्व बता रहे हैं। उद्धव ठाकरे ने हाल ही में सभा में कहा था कि शिवसेना पार्टी नहीं होती तो महाराष्ट्र में गुजराती होते ही नहीं। वहीं नरेंद्र मोदी रैली में प्रचार के दौरान पिछड़े वर्ग के चहेते नेता गोपीनाथ मुंडे का नाम बार बार ले रहे हैं। वहीं गोपीनाथ मुंडे की बेटियों को भी चुनाव में खड़ा किया गया है। इसी तरह पिछड़ी जाति समुदाय के वोट को आकर्षित करने की कोशिश जारी है।
दूसरी ओर मराठा वोट के लिए भी भाजपा ने शिवाजी का नाम अलापना शुरू कर दिया है। इस बार भाजपा ने शिवसेना का शिवाजी महाराज का नारा हाईजेक कर लिया है। भाजपा अपनी रैलियों में भारत माता की जय के नारे के अलावा इस बार भाजपा शिवाजी के नारे लगा रही है।
केंद्र की सत्ता हाथों से जाते देख गठबंधन टूटने से पहले एनसीपी-कांग्रेस सरकार ने मराठा कार्ड खेला। महाराष्ट्र राज्य में मराठी समुदाय के लोगों को आरक्षण देने के लिए मुद्दा उछाला गया। वोट बैंक को तोल मोलकर राज्य सरकार ने मराठा आरक्षण पर मुहर लगा दी। मराठा समुदाय को 16 फीसदी आरक्षण लागू कर दिया गया। वहीं मुस्लिम समुदाय के लिए भी 5 फीसदी आरक्षण लागू कर दिया गया।
जिस राज्य में किसान गरीबी में आत्महत्या कर रहा हो उसी समय ऐसे गंभीर मुद्दों से हटकर विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले किसी समुदाय विशेष को आरक्षण का लोलीपोप दिखाने को क्या कहा जा सकता है। सही मायनों में समझा जाए तो केंद्र में सत्ता हाथ से छूटने के बाद कांग्रेस ने महाराष्ट्र की सत्ता के लिए एक जातिवाद का समीकरण रच दिया। सवाल तो यह है कि अगर इस आरक्षण के मुद्दे को उठाने और लागू करने की क्या जल्दी थी।
महाराष्ट्र जनसंख्या में मराठा समुदाय करीब 30 फीसदी है तो वहीं मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या 10 फीसदी है। ऐसे में करीब 40 मतदाता कांग्रेस-एनसीपी के लिए भावुक हो सकता है।
महाराष्ट्र में पहले से ही 52 आरक्षण लागू है। और 16 फीसदी आरक्षण मराठा को और 5 फीसदी आरक्षण मुस्लिम समुदाय के लिए लागू करने से राज्य में लागू किया कुल आरक्षण 73 फीसदी हो गया। सबसे पहले पचास फीसदी से ऊपर आरक्षण लागू करने तो पहले ही कानून और नियमों के विपरीत है।












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