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शिवाजी महाराज की मूर्ति गिरने पर विवाद, महाराष्ट्र में बांग्लादेश जैसे हालात बनाने की कोशिश में विपक्ष!

सिंधुदुर्ग जिले के मालवण के राजकोट किले में स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज की मूर्ति गिरने से महाराष्ट्र में विवाद छिड़ गया है। इस मामले पर सरकार ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और सिंधुदुर्ग जिले के संरक्षक मंत्री ने जनता से माफी मांगी और घटना पर दुख व्यक्त किया। प्रतिमा गिरने के पीछे की वजह की जांच चल रही है।

इसके लिए नौसेना और राज्य सरकार की एक संयुक्त समिति गठित की गई है। मूर्ति की स्थापना में शामिल शिल्पकार और स्ट्रक्चरल ऑडिटर पर मामले दर्ज किए गए हैं। हालांकि, विपक्ष ने इस घटना का इस्तेमाल सरकार की आलोचना करने और जातिगत विभाजन को भड़काने के लिए किया है।

Maharashtra Shivaji Statue Collapse

मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने हाल ही में एक संयुक्त बैठक कर नौसेना और राज्य सरकार की संयुक्त समिति बनाने के निर्णय की घोषणा की। साथ ही राजकोट में ही छत्रपति शिवाजी महाराज की भव्य मूर्ति स्थापित करने की घोषणा भी की गई है।

विपक्षी नेताओं ने किया किले का दौरा

विजय वडेट्टीवार, अंबादास दानवे, जयंत पाटिल, सतेज पाटिल और आदित्य ठाकरे समेत कई विपक्षी नेताओं ने स्थिति का जायजा लेने के लिए किले का दौरा किया। संजय राउत और जितेंद्र अवध ने सोशल मीडिया पर गिरी हुई मूर्ति की तस्वीरें शेयर कीं, जिससे तनाव और बढ़ गया। महाराष्ट्र की जनता ने इन कार्रवाइयों को अभूतपूर्व और शर्मनाक माना है।

विपक्ष के इस कदम की आलोचना जातिगत निहितार्थों के लिए भी की गई है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान नेताओं ने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों की जाति का जिक्र किया। इस कदम को महाराष्ट्र की सामान्य राजनीतिक मर्यादा से अलग माना जा रहा है। उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का मजाक उड़ाने वाले कार्टून और वीडियो शेयर किए जा रहे हैं, जिसमें उन्हें पेशवाओं का वंशज बताया गया। इस तरह की हरकतों ने सांप्रदायिक तनाव भड़काने के प्रयासों के बारे में चिंता जताई है।

जातिगत विभाजन पर ध्यान केंद्रित

विपक्ष के दृष्टिकोण की आलोचना इस बात के लिए की गई है कि वह व्यापक मुद्दों को संबोधित करने के बजाय जातिगत विभाजन पर जोर देता है। उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज की समावेशी नीतियों को नजरअंदाज किया है और इसके बजाय राजनीतिक लाभ के लिए उनकी विरासत का दोहन किया है। कांग्रेस एनसीपी नेताओं की भी आलोचना की गई है कि उन्होंने मुगल बादशाह औरंगजेब के नाम पर औरंगाबाद का नाम बदलने के मुद्दे पर बात नहीं की, जबकि औरंगजेब जैसे मुगलों की प्रशंसा की।

ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के बीच टकराव पैदा करने में शरद पवार की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है। विपक्ष की हरकतों को महाराष्ट्र में सामाजिक विभाजन पैदा करके वोट हासिल करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसी चिंताएं हैं कि इस रणनीति का उद्देश्य महाराष्ट्र को बांग्लादेश जैसा बनाना है।

जनता की प्रतिक्रिया

महाराष्ट्र में आम जनता ने प्रतिमा ढहने की घटना के राजनीतिकरण और विपक्षी नेताओं द्वारा जातिगत विभाजन पर ध्यान केंद्रित करने की कड़ी आलोचना की है। इन कार्रवाइयों को महाराष्ट्र की राजनीतिक परंपराओं को कलंकित करने और विभिन्न समुदायों के बीच तनाव भड़काने के रूप में देखा जा रहा है।

कुल मिलाकर छत्रपति शिवाजी महाराज की मूर्ति ढहने से जुड़ा विवाद महाराष्ट्र में गहरी राजनीतिक दरार को दिखा रहा है। सरकार की प्रतिक्रिया विपक्ष की विभाजनकारी रणनीति से बिल्कुल अलग है, जो राज्य के भीतर एकता बनाए रखने में चल रही चुनौतियों को दिखाता है।

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