Mumbai Local Train: लोकल ट्रेन में नाबालिग लड़की का शख्‍स करता था यौन उत्‍पीड़न, अब मिली तगड़ी सजा

Mumbai Local Train: मुंबई लोकल ट्रेन में नाबालिग के छेड़छाड़ के एक मामले में 27 वर्षीय व्यक्ति को तीन महीने कैद की सजा सुनाई है। यह मामला एक लोकल ट्रेन में नाबालिग से यौन उत्पीड़न से संबंधित है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सामान्य डिब्बे में यात्रा करने से किसी भी पुरुष यात्री को महिला को बार-बार छूने का अधिकार नहीं मिल जाता।

विशेष न्यायाधीश नीता आनेकर ने 1 नवंबर को यह आदेश पारित किया। उन्होंने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354(D) (पीछा करना) और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत आरोपी को दोषी ठहराया।

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कोर्ट ने सुनाई तीन महीने की सजा

अदालत ने उसे तीन महीने की जेल की सजा सुनाई, लेकिन ट्रायल के दौरान 4 जनवरी 2019 से 15 अप्रैल 2019 तक हिरासत में बिताई गई अवधि को इसमें समायोजित करने की अनुमति दी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 17 वर्षीय पीड़िता ने बताया कि आरोपी लगभग एक साल से उसका पीछा कर रहा था।

हर दिन ट्रेन में चढ़ कर करता था गंदी हरकतें

वह बार-बार उसी ट्रेन के डिब्बे में चढ़ जाता था जिसमें पीड़िता बोरीवली से विले पार्ले स्थित अपने कॉलेज जाती थी। अभियोजन पक्ष ने बताया कि 4 जनवरी 2019 को हुई विशेष घटना के समय पीड़िता अपने बड़े भाई के साथ यात्रा कर रही थी।

नाबालिग के साथ की गंदी हरकत

पीड़िता और उसके भाई शाम करीब 6 बजे विले पार्ले स्टेशन से बोरीवली की धीमी लोकल ट्रेन में चढ़े। आरोपी भी उसी ट्रेन में चढ़ा और पीड़िता के पास खड़ा हो गया। जब ट्रेन अंधेरी स्टेशन पहुंची, तो आरोपी पीड़िता के करीब आया, उसे धक्का देने लगा और बार-बार उसकी जांघ को छूने लगा।

ऐसे पकड़ा गया हैवान

पीड़िता ने अपने भाई को इशारा किया, जिसने घटना देखी और आरोपी को पकड़ लिया। इसके बाद बोरीवली स्टेशन पर पुलिस अधिकारियों की मदद से आरोपी को पुलिस स्टेशन ले जाया गया। अदालत ने पीड़िता और उसके भाई की गवाही को स्वीकार करते हुए कहा कि पीड़िता के पीछा किए जाने और छूने के बयानों पर भरोसा किया जा सकता है।

बचाव में क्‍या बोला शख्‍स?

बचाव पक्ष ने पीड़िता की गवाही को इस आधार पर चुनौती दी थी कि आरोपी के पास फर्स्ट क्लास का पास था, इसलिए उसे व्यस्त समय में सेकंड क्लास में यात्रा करने का कोई कारण नहीं था। अदालत ने जोर देकर कहा कि मुंबई जैसे शहर में ऐसे समय में सेकंड क्लास के डिब्बे अत्यधिक भीड़भाड़ वाले होते हैं।

क्‍या बोली अदालत?

अदालत ने कहा, "हालांकि, पीड़िता के फर्स्ट क्लास पास होने के बावजूद सेकंड क्लास के डिब्बे में यात्रा करने का तथ्य उसकी गवाही को अविश्वसनीय बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।" विशेष न्यायाधीश ने बताया कि जिरह के दौरान यह कहा गया था कि उसके कॉलेज के दोस्त अक्सर उसके साथ यात्रा करते थे और वे आमतौर पर सेकंड क्लास के डिब्बे का उपयोग करते थे।

अदालत ने टिप्पणी की, "यह पूरी तरह से संभव है कि पीड़िता ने अपने दोस्तों के साथ सेकंड क्लास के डिब्बे में यात्रा करना चुना हो।" अदालत ने आगे कहा, "जबकि यह सच है कि प्रश्नगत डिब्बा महिला यात्रियों के लिए आरक्षित नहीं था, यह किसी भी पुरुष यात्री को एक महिला यात्री को बार-बार छूने का औचित्य नहीं देता है।"

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