मुंबई की राजनीति अखाड़े में फिर ‘हफ्ता वसूली 2.0’ पर मचा बवाल, बढ़ा सियासी पारा
Mumbai BMC Election 2026: महाराष्ट्र में नगर महापालिका चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ है, और मुंबई पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सभी प्रमुख राजनीतिक दल कमर कस चुके हैं। इसी बीच, शिवसेना (यूबीटी) और महाविकास अघाड़ी (MVA) के पिछले कार्यकाल से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मुद्दे एक बार फिर चर्चा का विषय बन गए हैं। विरोधियों ने 'हफ्ता वसूली 2.0' और 'कट-कमीशन' जैसी 'संस्कृति के दोबारा पनपने' की आशंका व्यक्त करते हुए, महाविकास अघाड़ी के शासनकाल पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े किए हैं।
मुंबई की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से टैक्सी चालकों, रिक्शा चालकों, छोटे दुकानदारों और रेस्तरां मालिकों के अथक परिश्रम पर टिकी है। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में एक विशिष्ट चर्चा जोर पकड़ रही है। आशंका जताई जा रही है कि सत्ता परिवर्तन की स्थिति में एक बार फिर 'हुड़दंग' और 'वसूली' का दौर लौट सकता है।

1.आम मुंबईकर बनाम वसूली का 'नैरेटिव'
विपक्षी दलों का दावा है कि इससे छोटे कारोबारियों से जबरन पैसे वसूलने की पुरानी प्रथाएं, जिन्हें 'हफ्ता' कहा जाता है, फिर से अपनी जड़ें जमा सकती हैं। यह मुद्दा केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि सामान्य मुंबईकरों की सुरक्षा और उनके दैनिक जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
2. सचिन वाज़े प्रकरण और 'एक्सटॉर्शन' की छाया
भ्रष्टाचार पर बहस के दौरान 'सचिन वाझे' का नाम आज भी चर्चा में है। अंटालिया विस्फोटक प्रकरण और वसूली के आरोपों ने तत्कालीन सरकार की किरकिरी कर दी थी।
इस मामले में उच्च-पदस्थ अधिकारियों तक तार पहुंचने के आरोप लगे थे। "अगर देश के सबसे धनी व्यक्ति को भी निशाना बनाया जा सकता है, तो सामान्य व्यक्ति का क्या होगा?" यह सवाल अब आमजन के मन में घर कर रहा है, जिसे 'ब्रांड मुंबई' की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है।
3. BMC: विकास का केंद्र या 'कैश मशीन'?
एशिया की सबसे धनी बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) अब सवालों के घेरे में है। विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के वर्षों में निविदा प्रक्रियाओं और परियोजनाओं के क्रियान्वयन में 'कट और कमीशन' का गणित साफ दिखता है।
आलोचकों का आरोप है कि हर परियोजना में निश्चित कमीशन तय होने और पसंदीदा ठेकेदारों को काम मिलने से मुंबई के बुनियादी ढाँचे की गुणवत्ता गिरी है। मुंबईकरों के कर का पैसा विकास से ज़्यादा राजनीतिक तिजोरी भरने में लगा, यह आरोप अब और धारदार हो गया है।
4. कोविड काल के 'खिचड़ी' और 'बॉडी बैग' घोटाले
कोविड-19 के मानवीय संकट के दौरान भी भ्रष्टाचार का पनपना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण रहा। कथित 'बॉडी बैग' और 'खिचड़ी' घोटालों ने महाविकास अघाड़ी की नैतिक साख कमजोर की है। ऐसी आपदा में भी मुनाफा कमाने की यह प्रवृत्ति जनमानस में राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा मानी जा रही है।
किसे मिलेगी मुंबई की सत्ता की चाबी?
मुंबई के आगामी चुनावों में मतदाताओं के सामने दो स्पष्ट विकल्प हैं: एक तरफ 'विकास का विजन' तो दूसरी ओर 'भ्रष्टाचार के आरोप'। इन्हीं मुद्दों पर वे अपना जनादेश तय करेंगे।
यदि 'हफ्ता वसूली' और 'कमीशन' से जुड़ा नैरेटिव मतदाताओं तक पहुंच पाया, तो यह चुनाव परिणाम बदलने में पर्याप्त साबित होगा। मुंबई को सच में पारदर्शी शासन चाहिए या पुरानी 'व्यवस्था' से ही निपटना होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।












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