Who is Chhagan Bhujbal: सब्जी बेचने वाले छगन भुजबल ने कभी बालासाहेब को कराया था अरेस्ट?
Maharashtra NCP Crisis:महाराष्ट्र की सियासित में एक बार फिर उलटफेर हुआ है। एनसीपी नेता छगन भुजबल ने भी बीजेपी का दामन थाम लिया है। शिंदे सरकार में मंत्री बन गए हैं।
Maharashtra NCP Crisis: महाराष्ट्र की सियासी जमीन पर एक बार फिर भूचाल आ गया है। अजित पवार ने एनसीपी का हाथ छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया है। इतना ही नहीं, राज्य के उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ भी ली है। उनके साथ ही 18 विधायकों ने भी बीजेपी का समर्थन किया है। वहीं, एनसीपी नेता छगन भुजबल ने भी बीजेपी का दामन थामते हुए शिंदे सरकार में मंत्री पद की शपथ ली।
छगन भुजबल, वह व्यक्ति जिन्होंने अपने गुरु शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे को आज से 23 साल पहले गिरफ्तार करवाया था। सब्जियां बेचकर गुजारा करने वाले भुजबल का राजनीति में कदम रखने की कहानी बेहद दिलचस्प है। आइए पलटते हैं भुजबल के इतिहास के पन्नों को...

सब्जी विक्रेता से कैसे बने नेता?
महाराष्ट्र के नासिक में 15 अक्टूबर 1947 को छगन भुजबल का जन्म हुआ। मुंबई की भायखला मंडी में भुजबल सब्जी विक्रेता थे, जहां उनकी मां की एक छोटी सी फलों की दुकान चलाती थीं। इसी दौरान 1960 के दशक में बाल ठाकरे का एक भुजबल ने भाषण सुना। भुजबल इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने शिवसैनिक बनने की ठान ली। इसके बाद छगन भुजबल कुछ ही सालों में एक ताकतवर नेता भी बने।
गुरु को शिष्य भुजबल ने कराया था अरेस्ट
ओबीसी समाज में अच्छी पकड़ रखने वाले भुजबल ने बालासाहेब के करीबी नेताओं में खुद को शुमार कर लिया। 1985 में ठाकरे ने मनोहर जोशी को राज्य विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया। इससे भुजबल और बालासाहेब के बीच खटास आ गई। भुजबल को महानगरपालिका यानी बीएसमी की सियासत में ढकेल दिया गया। भुजबल मेयर बने।
5 दिसंबर 1991 को भुजबल ने बाल ठाकरे के खिलाफ विद्रोह किया। शिवसेना में बड़ी फूट डालकर 18 विधायकों को अपने साथ कर शिवसेना-बी नाम का एक अलग गुट बनाया। उसके बाद समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस की सदस्यता ली। 1999 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस-एनसीपी ने सरकार बनाई और भुजबल उपमुख्यमंत्री बने।
2000 में, उन्होंने वह किया जो पहले किसी ने करने की हिम्मत नहीं की थी। उन्होंने 1992-93 के दंगों के संबंध में सेना के मुखपत्र सामना के खिलाफ एक मामले में बाल ठाकरे को गिरफ्तार कर लिया। अदालत ने ठाकरे को बरी कर दिया, लेकिन भुजबल ने अपनी बात रख दी थी।
स्टाम्प पेपर घोटाले में फंसे भुजबल
हालांकि, तीन साल बाद, उन्हें तेलगी स्टांप पेपर घोटाले को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ा और उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा। सीबीआई ने मामले की जांच की और भुजबल से पूछताछ की। लेकिन वह उस प्रकरण से बचकर निकल आए। 2009 में फिर से उपमुख्यमंत्री बनाए जाने पर उन्होंने वापसी भी की। 2010 में, उन्हें अजित पवार के लिए पद खाली करना पड़ा, लेकिन सार्वजनिक कार्यों के प्रभारी मंत्री बने रहे। भुजबल दो बार मुंबई के मेयर भी रह चुके हैं। भुजबल 2004 से विधायक हैं।
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